Saturday, 2 March 2024

अगला स्टेशन

अगली सीट तुम्हारी थी
तुम सफर मे सबको प्यारी थी,
तुम्हारी बाते मनरंगी
साथ तुम्हारा सत्संगी,
तुम्हारे किस्से बचपन के
शब्द तुम्हारे उपवन से,
क्षेत्र तुम्हारा त्रिभुवन-सा
मित्र तुम्हारे मोहन से,
प्रश्नों की गठरी रेशम की
अनुभव की पोटली दर्पण-सी,
सीखने की चाहत भँवरे की
राग जुटाती हर कण की,
उन्माद नदी के कलकल सी
आह्लाद भोर के कोकिल-सी,

पर अगला स्टेशन तुम्हारा है
इस सफर का यही किनारा है!

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