केंद्र मे सत्संग,
केंद्र से हटकर
है जरा विध्वंस,
केंद्र के सब ओर
केंद्र के हैं छोर,
केंद्र से अर्जित
उर्मियों के डोर,
जब केंद्र परिभाषित
और आनंदित,
मध्य मार्ग सुगंधित
सत्य और पुलकित!
फैसला हक में हमारे कर दो आज इंसान बनकर, कब तक रहोगे मौन मन मे महज चित्कार कर, जो है सभी स्वीकार उसको स्याह कर दो, आज लोगों की जुबाँ की राह ...