कर दो आज इंसान बनकर,
कब तक रहोगे मौन
मन मे महज चित्कार कर,
जो है सभी स्वीकार
उसको स्याह कर दो,
आज लोगों की
जुबाँ की राह कर दो,
धुंध और कर्कश की
वाणी से विवश हो,
क्या चला है धर्म
कभी परवश हो?
झूला झूले रज का कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच करते नृत्य जुगलबंदी...