Saturday, 16 March 2024

सफेद झूठ

मुस्कान को तुम्हारी 
बोल दिए कुछ झूठ,
रो न देना तुम 
हम रो बैठे झूठ-मूठ,

तुम भूल जाओ वो याद 
हमने बात बनाई कुछ,
तुम रहो न फ़िक्र से त्रस्त 
हमने बात घुमा दी कुछ,

समाज न समझे कुछ 
हम बन जाते कुछ मुर्ख,
तुम खो न दो कुछ वक्त 
हम धारण कर बैठे मौन,

पर तुमने परख जुटा 
और पकड़ लिया ही 
सफ़ेद धवल झूठ!

No comments:

Post a Comment

ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...