Sunday, 18 December 2022

गंगा मित्र

ये पीपल के पेड़
उग जाते हैं छत पर,
मुहानों पर और
सड़क के किनारों पर,

इन्हे बीज की, खाद की
मुट्ठी भर जमीन की,
सिंचाई की, गुढ़ाई की
थाल की और कांट छांट की
क्या पड़ी जरूरत

ये उड़ के फैल जाते
ये धूल में खिल जाते
ये पी लेते एक बार
छू के गंगा के विस्तार,
ये तोड़ घर मकान
झुकाते शीश मां के द्वार
कर बद्ध खड़े वीर
यहीं हैं सच्चे गंगा मित्र!


No comments:

Post a Comment

अधिकार

तुम पर है अधिकार  तुम्हारे होने का चलने का,  तुम्हारे बातें मुझसे करने का  और फिर तुमसे मिलने का,  यह बोलो और फिर शांत रहो मैं सोचूँ और तुम ...