Sunday, 20 April 2025

इलाहाबाद

हमारा शहर था 
हमारा था, 
हमारा ठिकाना 
अपना ठिकाना, 
गंगा का किनारा 
यारों का सहारा,
पढ़ने की लत 
और उड़ने की हद,
सबको मिला था 
खुला आशियाना, 

पेड़ों के नीचे 
पढ़ाई-लिखाई, 
मटके का पानी 
और सत्तू मे लाई, 
आम के जोड़ों के 
किलो भर निवाले, 
आंदोलनों के भरे
किस्से अखबारें,
किसी हशरतों को
मन में दुहराना!


No comments:

Post a Comment

ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...