Monday, 9 June 2025

प्रणाम

एक बार फिर 
बिना मतलब 
प्रणाम लिख दो,
तुम मेरे नाम 
कोई बात लिख दो,
हम बार-बार झांकते हैं
तुम्हारे मैसेज बाॅक्स मे
गाहे-बगाहे 
एक मुस्कान लिख दो,

कुछ मांग लो अधुरे 
ख्वाहिशों की फेहरिस्त से,
कुछ सुना दो अपने
महकमों के किस्से, 
कुछ शिकायत होगी तुम्हारी
इस दुनिया जहां से,
कुछ थामी होगी जुर्रत 
तुमने एक हाथ से,
कुछ खुलने वाली 
जुबाँ तुमने ऐंठ दी होगी,
किसी अबला कि खातिर 
फिर कोई तकलीफ ली होगी,
अख़बार समझ मुझको
कोई पैगाम लिख दो!

अधूरे प्रेम पर तूमने
कई टेसू बहाए हैं,
मेरी माँ के आँचल से
महज काटे चुभाए हैं,
मेरी बाहें पकड़कर 
खींचने का मन तुम्हारा था,
मेरे कंधों पे सर रखकर
बहुत रोना-बिलखना था,
मेरे चुपचाप जाने से
छुआ ब्रह्मांड भर का शोर,
कई बातों के उत्तर मे
मिलें प्रश्नों के खुले छोर,
मुझे इंकार कर मेरे लिए 
एक अंजाम लिख दो!


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