Tuesday, 3 October 2017

मुक्ति की आकांक्षा

चिड़िया को लाख समझाओ,
की पिंजरे के बाहर आओ,

पर वो कहेगी, 'नहीं!'
मैं यहीं पर हूँ सही।

मेरा पिंजरा, 'सोने का है !'
फिर काहे को रोने का है ?
यहाँ सभी सुख-चैन है,
AC, fridge, Cooler-fan है

यहाँ बैठे बिठाए खाना है,
बस एक चोंच ही हिलाना है,
हर बख़त पानी कटोरा है भरा,
मीठा स्वाद है उसका, बहुत ही सुनहरा!

पर बाहर तो ताज़े फल हैं
और 'सुमन' के दाने है,
पानी के झरनो मे घुलते
तुम्हारे कलरव-गाने हैं!

और खुली हवा की साँस है,
आज़ादी का अहसास है।
'नहीं ! बाहर ज़िंदगी बकवास है,
परीक्षा है हर घड़ी, हर दिन एक class है।

यहाँ छोटा-सा मेरा झूला है,
वो मेरा ख़ुद का अकेला है,
सीख़चो का पहरा कड़ा है,
नहीं जान का ख़तरा बड़ा है!

बाहर पेड़ की ऊँची फुलगियाँ है,
जहाँ से दिखती सारी दुनिया है,
डालियों पर फुदकना है,
सभी के संग चहकना है!

और तुम्हारा मन था उड़ने का,
किसी के साथ उड़ने का,
हाँ ! पर मेरे पिता का नहीं है,
और वो जो भी हैं, सही हैं।

उन्होंने ही तो उड़ना सिखाया था,
पंखों को खुलना सिखाया था,
आँधी-से, थपेड़ों-से जब डगमगायी,
थामकर ऊँगली, सम्भलना सिखाया था।

हाँ................! सिखाया तो था !

सीख नहीं पायी मै, उड़ने की कला
जो कुछ भी सीखा, बड़े धीमे से सीखा,
गा नहीं सकती कोई 'रामकली',
अदनी-सी चिड़ियाँ मै, नहीं 'श्यामकली !'

और.........
मेरा भाई भी तो है,
वो उड़ना जानता है,
वो उड़ेगा मेरी तरफ़ से.......

Saturday, 23 September 2017

क्या हुआ ?

क्यूँ फ़ोन किया था ?
कुछ कहना है ?
कुछ बताना है ?
कुछ पुछना है ?
कुछ जताना है ?

मै कुछ नया तो
करती नही,
तो उसी बात को
क्यूँ बार-बार दुहराना है ?

क्या करूँगी सुनकर,
तुम्हारी भी बातें ?
मुझे कौन- सा उसपे
थिसिस बनाना है ?

परीक्षा है मेरी,
मुझे पाठ दुहराना है।
कुछ बच्चों को शाम को,
ट्युशन पढ़ाना है।

कोई काम भी है मुझको,
थोड़ा बाहर भी जाना है।
आज छुट्टी है सबकी
वो अलग ही फ़साना है।

कल क्लास थोड़ी जल्दी है,
मुझे तड़के ही जाना है ।
आज भी बहुत काम था,
तो सोई नही हूँ,
उसका भी कोटा,
मुझे आज ही भूनाना है।

ख़ैर तूम्हे तो सब पता है
तो फिर क्या समझाना है ?

और कहो! क्या हुआ ?
तुम्हे कुछ सुनाना है ?

'नहीं! कुछ नहीं,
बस यूँ ही!'

Friday, 1 September 2017

जिसे ढ़ुंढ़ती है मेरी नज़र

वो जो सुबह पार्क मे
जॉगिंग करने अाती है,
मेरे बग़ल से दौड़कर
गुज़र जाती है,

वो मेरे साथ चल पाती
तो वो तुम होती।

वो जो पुस्तकालय मे
अाखिरी सीट पर बैठती है,
मन मे शरारत लिये
मुझसे नाहक ऐंठती है,

वो ज़रा ग़ुस्सा कर पाती
तो वो तुम होती।

वो जो क्लास मे प्रश्न
बार-बार पूछती है,
पर जवाब मे वजह
अपना ही ढ़ूंढती है,

वो 'नालायक' मुझे कह पाती
तो वो तुम होती।

वो जो छुपकर
करती है बातें मुझसे,
वो जो समझती है
ख़ुद को चालाक ख़ुद से,

गर मुझको भी समझ पाती
तो वो तुम होती।

वो जो होंठों को भींचकर
शरारत छुपाती है,
फिर भी अनचाही हँसी
जिसकी छूट जाती है,

जो आँखों से मुस्कूराती है,
जो तबियत से खिलखिलाती है,
जिसकी ख़ुशी मन से,
पूरे चेहरे पर छा जाती है,

वो दिखने मे काली होती
तो वो तुम होती।

जो वक़्त के साथ
थोड़ा तेज़ दौड़ पाता,
जो ग़ुस्से को थोड़ा-सा
और झेल पाता,

जो बातों को ढ़ंग से
कुछ और कह पाता,
जो बंधन मे थोड़ी देर
और रह पाता,

जो मन से उजला होता,
तो वो मै होता।

Wednesday, 12 July 2017

Politician की बेटी

तुम झूठ बोलकर भी
विचलित नही होती,
मै सच जानकर भी
मुस्काता नहीं हूँ।

तुम हर बात पर
वादा कोई कर देती हो,
मै हर उस बात को
फिर दुहराता नहीं हूँ।

तुम POLITICIAN की बेटी, मै R. K. LAXMAN का पोता हूँ।

तुम सेखियाँ बघार कर
मचल जाती हो,
मै चुपचाप
उस अदा पर मर जाता हूँ।
तुम PHONE उठाने से पहले
संभल जाती हो,
मै PHONE करने के लिए ही
बस कर जाता हूँ।

तुम DEMONETISATION, मै रवीश की कविता हूँ।

तुम सजोती हो रिश्ते
FUTURE के लिए,
मै हूँ की हर पल
बदल जाता हूँ।

तुम दिल से हो मेरी
दिमाग से नहीं,
मै दोनों मे अंतर
समझ जाता हूँ।

तुम नेहरू सी PM! मै गाँधीजी सा नेता हूँ।



Thursday, 8 June 2017

कभी phone तुम भी किया करो

 कितनी बार किया है मैंने
कभी फ़ोन तुम भी किया करो 

कभी दिल्ली की बातें बताया करो,
कभी मुंबई शहर में घुमाया करो,
जो करती हो PhD किसी field मे
चाहे उसी का रोब दिखाया करो

युहीं SCROLL करते हुए फ़ोन पर 
कभी मेरा भी नंबर घुमाया करो 

कभी उलझन मे अपनी फसाया करो,
कभी बातों से अपनी डराया करो,
कभी TRAIN की तो कभी rain की 
कोई लम्बे से किस्से सुनाया करो

नासाज़ हो जो की तबियत तुम्हारी,
कभी मुझसे भी दिल बहलाया करो

कभी मम्मी से बातें कराया करो,
कभी गाना भी कोई सुनाया करो,
हर जनमदीन देती थी पहली बधाई,
कभी उसी बात को दुहराया करो

अब तो पैसो की किल्लत नहीं है तुम्हे,
पर जो चाहो तो miss call ही ज़ाया करो

मेरे रोने पे तुम भी तो रो देती थी,
मेरे ख्वाबों मे खुद को पिरो देती थी,
अपनी सखियों से लेती थी मेरी खबर भी,
जानती थी की तुमपर है मेरी नज़र भी

वो यादें अभी जेहन से लगी हैं
कभी झरोखों से परदे हटाया करों

हाँ ! किया था ये वादा मिलेंगे नहीं फिर,
इतनी सिद्दत से न उसको निभाया करो |



Wednesday, 15 February 2017

जुलूस

खुद को जो देखा
तुम्हारी नज़र में

मेरी कुर्बत न मेरे
मुक़म्मल से थी,
मेरी पहचान नासाज़
मौसम-सी थी,
जो किसी धुंध में
कोई गफलत सी थी

कभी अच्छे सहर मे
भी जागा करो  ।

खुद को जो देखा
तुम्हारे शहर मे,

हर बाशिंदे को
मेरी भी पहचान थी,
बस जुबाँ ही थी
जो मेरी अनजान थी,

बोलती-सी थी कुछ
सहमी आवाज़ मे,
कुछ मीनारों मे
यलगार की आग थी,

मै हूँ आया वकालत
से जिसकी यहां,
एक मूरत खड़ी थी
उसी नाम की,

मैंने पाया मीनारों
से लिपटी हुयी,
मेरे लफ़्ज़ों की पूरी
तो दास्तां थी,

मेरे शब्दों चुनकर
दीवारों से तुम,
कभी अपनी ग़ज़ल मे,
पिरोया करो ।

खुद को जो देखा
तुम्हारी नज़र से,

ढुढती थी वो तुमको
मेरे शहर में,
पूछती थी वो किस्से
तेरी गुफ्तगूँ के,
मांगती थी वो उज़रत
कई जुस्तजूं के

खुद ही पाओगी
खुद को खुदा-सी मुकम्मल,
कभी खुद को भी
मेरी नज़र से तो देखो । । 

Sunday, 16 October 2016

फ़ोन ही नही उठाती हो !

आज फिर तुम्हारा जन्मदिन था 
मैंने फिर से फ़ोन कर दिया 

पर तुम हो की फ़ोन ही नही उठाती हो !

बस इतना पूछता की 
मुम्बई कैसी है ?
तुम कैसी हो ?
लाइफ कैसी है ?
जॉब कैसी है ?

फिर से तो कंपनी 
चेंज कर ली क्या ?
और वो तुम्हारे  
स्टार्ट उप का क्या हुआ ?

क्या तुम अभी वैसे ही रैंडम घूमने निकल जाती हो ?
HN मे icecream, और मटका कुल्फी खाती हो ?

पर तुम हो की फ़ोन ही नही उठाती हो !

यह बताता की

यह कविता सच में
तुम्ही पर लिखी है,
यह जापान से
गंगा तक बही है,

गोवा भी है,
और BHU भी,
केजरीवाल भी है,
और JHV भी

क्या ट्यूशन अभी भी पांच बजे पढाने जाती हो ?
क्या खाना अभी भी दोनों हाथो से खाती हो ?

कुछ discuss भी कर लेता,

जो VENEZUELA मे आग लगी है,
तुमने विकिपीडिया पढ़ी है ?
तुम्हारी कहानी क्या
शशि थरूर से आगे बढ़ी है ?

'CERSIE' का attitude
अच्छा क्यों है ?
तुम्हारा मन अभी भी
बच्चा क्यों है ?
TURING मशीन का मकसद समझाता !

'महात्मा गाँधी' के नाम से तुम चिढ जाती हो !
अभी भी 'Feminism' के नाम पर लड़ जाती हो ?

पर तुम हो की फ़ोन नहीं उठाती हो !

व्यस्त हो या नाराज़ हो ?
काम है या पढ़ाई है ?
घर पर हो या बाहर हो ?
Network prob. है balance का ?
फ़ोन का या सिम कार्ड का ?
Notebooook का या tab ka
Facebooook ka ya Whatsapp ka ?

तुम कुछ भी तो नहीं बताती हो
और फ़ोन भी नही उठाती हो !!!!



























Monday, 11 July 2016

तुम

तुझसे बातें करूँ
तुझसे मिन्नत करूँ,
तुझसे जिद्द भी करूँ
और बगावत भी,

कभी पलकों मे रखके
इबादत करूँ,
कभी नज़र मे चढ़ाकर
शिकायत भी,

तेरी मुस्कान पे
आयतें भी लिखूँ,
तेरी नादानियों पर
हिदायत भी,

तुझको उड़ने भी दुँ
आसमां के परे,
तुमको पल्कों मे
रक्खूँ छुपाकर भी,

तुम मेरी कोशिशों की
आफ़रीन हो,
तसव्वुर का मेरी
तुम ही आमीन हो,

तुम रिसती हो मेरे
पिघलने से ही,
मै उमड़ता हूँ
तेरे उभरने से ही,

तुम "तुम" हो नहीं 
तुम मैं ही तो हूँ ।।

Thursday, 13 August 2015

जुस्तजूं

दिल को होते हैं तुझसे गिले शिक़वे गम
क्यों ना तुझे मै पूरा जान लुँ !!

सजदा करूँ तुझको शाम-ओ-सहर
ख्वाबों मे देखूँ तुझे हर पहर,
रूमानियत में भी 
तेरी करूँ इल्तिज़ा,

क्यों न तुझको मै ऐसा खुदा मान लुँ ॥ 

हर नज़र में मेरी 
तेरा ही अक़्स हो,
बिन तेरे न कोई 
फिर मेरा शख़्स हो,

माएने ज़िन्दगी के
कुछ ऐसे मै,

तेरे मकसद मे होना फ़ना मान लूँ ॥ 

सौदा गर जो करू 
अपना बाज़ार में,
मेरी बोली लगे तेरे 
आसार मे,

उस मुवक्किल को 
अपनी मुक़द्दर मे मै,

क्यों न जन्नत का ही रहनुमा लुँ ॥ 


-धीरू 










Thursday, 2 May 2013

धीरज

पलकों मे कुछ स्वप्न लिए
जब साहिल पर तु आएगी, 
विस्तार देखकर सागर का
फिर मन ही मन घबराएगी

तब अपनी निर्दिष्ट सफलता पर
ऐ नाव ज़रा तु धीरज रख ।

अपनी धुन में रमा हुआ
जब नाविक तुझे निकालेगा,
जब ठहेरे पानी से खेकर
मझधार में तुमको तारेगा,

तब उसकी निश्छल मंशा पर
ऐ नाव ज़रा तु धीरज रख ।

जब तट पर करके प्रहार
तुझे वेग देगा मल्हार,
फिर धीमे से पीछे करके
जल को, देगा तुझको विस्तार,


तब उसकी अचल प्रबलता पर
ऐ नाव ज़रा
तु धीरज रख ।

छुट -मुट लहरों से मिलकर
जब तेरा मन उकसायेगा,
उन्मुक्त लहर से मिलने को
फिर तेरा मन ललचाएगा,

तब उसकी मंद कुशलता पर
ऐ नाव ज़रा तू धीरज रख । 

जब विलसित से मिल जायेंगे
कई बंधू तुझको राहों मे,
प्रेम-क्रीडा में मस्त कहीं
अल्हड़ सागर की बाँहों में,

तब अपनी व्याकुलता पर
ऐ नाव ज़रा तु धीरज रख ।


जब पहली बूँद मचलकर कुछ
तेरे मस्तक को चूमेगी,
लहरों की बाँहों से रिसकर
हर रोम में सिरहन झूमेगी,

तब अपनी उत्कंठा पर
ऐ नाव ज़रा
तु धीरज रख ।

इक बार अनंत के साए मे
तु बेसुध हो लहराएगी,
मदहोश किसी गहरायी मे
कई बार हिलोरे खाएगी, 

उन्मादों की उस सरिता में 
ऐ नाव ज़रा तु धीरज रख । 

जब तृप्त होकर अरमानों से 
निश्चल धारा मे ठहरेगी,
और यादों का उपहार लिये 
तु फिर से तट पर फेहरेगी,

तब तक नाविक झमता पर
ऐ नाव तु पूरा धीरज रख !!

Tuesday, 12 March 2013

एक मुस्कान

मुझे रास्ते में मिली,
एक प्यारी-सी  मुस्कान
ख़ुशी से लबरेज़,
एक भारी-सी मुस्कान
सुबह-सुबह खिली,
एक ताज़ी-सी मुस्कान ।


गुलाबी लबों में
बदन को सिमटती,
मोती के बिस्तर पर
करवट बदलती,
ख्वाबों को सँजोती
अलसाई-सी मुस्कान ।


आँखों से बहती
वो होंठों पर आई,
इठलाती-बलखाती
फिर चेहरे पर छाई,
मदहोशी में अंगड़ाई
एक भोली-सी मुस्कान ।


क्षितिज़ से उभरकर
फलक पर बिखरती,
कोरे दृगों मे
कई रंग भरती,
कुदरत मे पली
एक नयनाभिराम ।


निगाहों में कोई
कशिश-सी छुपाये,
ख़ामोशी से जैसे
ग़ज़ल कोई गाये,
किसी शायर की है
वो कलम की जुबां ।


कोई खुदगर्ज़ आदत,
कोई बिगड़ी-सी हरकत,
कोई बेख़ौफ फितरत,
कोई बेबाक हसरत,
परी लोक की
कोई नटखट शैतान |


कही कोई मंदिर की
गलियों से रिसती,
खुशबू जो हौले से
साँसों में बसती,
ज़न्नत दिखाती
एक पाकीज़ा एहसास ।


किसी रसिक भँवरे के
लबों पर पली-सी,
कचनार की एक
कमसिन कली-सी,
मय से भरी
एक मदहोश ज़ाम ।


अनजाने ही मेरे
लबों पे आ गई,
मेरे हृदय को
वो बहला गई,
रूक गया मै वहीं
मुस्कुराता रहा..
हर ग़म को मै
भुलाता रहा....


पल वो था रूका
मेरी आगोश मे,
न रहा मै भी उस
दरमियाँ होश मे
इक तसव्वुर मे
ख़ोया हुआ मै ज़रा
हर मंज़र को
मन में बसाता रहा ।


आँख झपकी मेरी , मै
संभल-सा चुका था,
मेरी गफ़लत में लम्हा
गुज़र सा चुका था,
पलभर का मंज़र
नज़र से मेरी,
दास्तां बनके दिल मे
उतर सा चुका था ।


कभी-कभी वापस
वो आ जाती है,
चेहरे पे फिर से
वो छा जाती है,
निराशा तिमिर में नई आश देती
अदिति-सी मुस्कान !!

ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...