Monday, 24 May 2021

आज़ाद

कुछ तो हम आजाद हैं, 
कुछ और किनारे बाकी हैं।

कुछ थालियों में खा चुके,
कुछ बैठ चुके छांवो में,
कुछ घरों में रह चुके 
कुछ दिल में रहना बाकी है।

हम बातें करते बिस्तर पर, 
हम बातें करते राम पर, 
हम साथ देखते जाति को, 
हम हाथ बटाते बच्चों पर,

उन पढ़ने वाली बातों को
अब मन में गढ़ना बाकी है।

Sunday, 23 May 2021

रात

रात भर तेरी याद
मुझको आती रही।

तुम जाती रही 
रात भर दूर मुझसे,
मुझे शिकवे सुनाती रही 
रात भर,
तुमसे चुप भी रहा और मनाता रहा,
तुमको खुद भी मुनासिब सुनाता रहा,
तुम न मानी मगर
मै बहुत ही समझाता रहा।

रात भर दिन की बात,
उभरती रही, 
रात भर दरवाजे तक बढ़ती रही 
रात भर, दिन की रोशनी ढूंढती, 
तुम उजाले से बिस्तर हटाती रही, 
मै न सोया, तुम न सोई, 
तुम मुझे रात भर यूं जगाती रही। 

मैने करवट ली, 
तो तुम नहीं थी बगल मे, 
तुम बगल में खड़ी बस मुझे 
हिलाती रही, डूलाती रही,
मै सोया तो था तुम्हे पाने के लिए 
तुम यही जानकर मुझे तिलमिलाती रही,
मेरे जीवन से जाना भर 
मुनासिब न था,
तुम सपनों से भी खुद को चुराती रही। 

मै जागा था जब रुखसत के लिए, 
जब समेटे थे कपड़े उस घर के लिए,
पूछा मैने कि घर है यह किसके लिए?
तुम तवज्जो लिए महटियाती रही। 

रोने लगी जब खुदा के लिए, 
तुम दामन को मेरे भिगाती रही, 
जो ना कहा, तुम गुमां मे रही, 
आंसू से मुझको बताती रही, 
राम को रात भर तुम जगाती रही,

रात भर तुम भी रोती रही,
रात भर तुम मुझे भी रूलाती रही।

भ्रम

मै भ्रम पालता हूं,
उसको देता विचार,
उसको देता समय, 
उसको रखता साथ-साथ 
उसमे रहता हर समय।

मै भ्रम की चिता जलाकर 
उसमे जलता दिन भर,
आत्मदाह मै करता,
पल-पल, हर पल।

भ्रम का धुँआ उठता,
मै गुर्राता, खीझ उठता,
अकुलाता,
मै भ्रम मे छुपकर 
आत्मा भुलाता,
मै भ्रम की चाहत मे
हीरा जन्म गंवाता।

मृग-मरीचिका मे 
चलते जाता, 
भ्रम मे रहता 
भ्रम फैलाता

मै भ्रम पालता।

Saturday, 22 May 2021

Characterless

तुम बता-बताकर 
बना-बनाकर,
मुंह को सबसे छुपा-छुपाकर 
रहती खुद के घेरे मे ही,
दोस्त मित्र को भगा-भगाकर।

गाली देकर डरा-डराकर,
कुछ लोगों को दबा-दबाकर,
लिपट-लिपटकर
रुला-रुलाकर।

फोन उठाकर
गढ़ती कहानियां,
टेसू अपने बहा-बहाकर 
डॉक्टर को भी,
सत्य को भी,
सबको गंदा दिखा-दिखाकर,
कीचड़ उनपर मसल-मसलकर,
करती उनका चरित्र तुम धूमिल,
अपना character,
गिरा-गिराकर।

राम-राम का मंतर जपती,
सीता सबकी चुरा-चुराकर।

Monday, 12 April 2021

Transaction

मुझको अच्छी लगती है,
बातें तुम्हारी कुछ भी हो, 
मुझको अच्छी लगती हैं,
गाली तुम्हारी आवाज मे हो।

मुझको अच्छा लगता है, 
जब timepass भी करती हो,
मुझको अच्छा लगता है,
जब मेरे साथ मे होती हो।

पर तुम जब होती साथ नहीं 
तो कुछ भी अच्छा नहीं लगे,
जब तुम करती हो बात नहीं 
तो तुम क्यों अच्छी नहीं लगी ?

क्या प्यार मेरा बस नाम का है?
Transaction ये किस काम का है?
दिव्यांशी वाली प्रीति क्या है? 
मीरा-तुलसी की रीति क्या है ?

तुम मेरे फोन की tariff हो 
जो खतम हो गयी बीच मे ही? 
या exam का नंबर हो,
जो cut-off के नीचे ही अटकी?

गलती मेरे एहसास की है,
फिर तत्व भला किस काम है?
बजरंग-बली को मोती तो,
बस नाम ’सियावर-राम’ का है!

Friday, 9 April 2021

हिय की राम

खल दल गंजनम् 
सर्वज्ञ मेरे प्रियतम् 
तुम मेरे हिय की सिया 
तुम हृदय की राम हो।

मन में धरी 
सुगंधित मेरी 
हिय कुंज कि तुम धाम हो,
तुम सिया मेरी 
तुम ही मेरी राम हो। 

मधुमालती हो भोर की, 
पारिजात मेरी रात की,
मेरे कटु वचनों को चुनती 
विश्राम कि तुम शाम हो,
सिय तुम मेरी दिवस की
तुम ही मेरी राम हो ।

तुम सुदर्शन-सोम रस हो 
तुम शिवम् की चांद भी,
तुम गजानन-राग हो 
तुम मारुति-ध्यान भी,
पंचवटी की वायु मधुर
तुम ही सिया की राम हो।

Monday, 22 March 2021

Manipulative

तुम हो कि 
मेरे प्यार का ख्याल हो गई हो
तुम हो की 
खुशी का पर्याय हो गई हो।

तुम हो कि 
भड़कती हर लड़की में दिखती हो,
तुम ही हो जो
हर मायूस चेहरे में दिखती हो,

तुम हर भावना की, मिसाल हो गई हो !

तुम ही हो पढ़ती
बगल में बैठकर, 
तुम ही हो सोती 
मेरी पलंग पर,
तुम ही देखती हो 
मुझको पलटकर,
तुम ही तो कहती हो 
बस कर, बस कर,
curved होंठों वाली 
लड़की तुम ही हो, 
जो हंसती नहीं है
वही तुम कहीं हो,

तुम पढ़ाई की मेरी, किताब हो गई हो।
 
नासिका–विवर 
थोड़े चौड़े हुए हैं,
आंखों में रेशे उभरे हुए हैं,
गाल जो हल्के से 
लाल पड़ गए हैं 
कश्मीरी सेब 
खट–मिठास हो गए हैं,
 
जो बताती नहीं है,
सोचती पर बहुत है, 
जो कहती नहीं 
रूठती हर बखत है,
जो है किसी बात पर चरमराई,
जिसकी नाक पर 
पसीने की बूंदें है आई,
नहीं सीधी है पर
मग में समझती,
खुद को कमजोर
समझ कर लड़ती,

तुम ego कि मेरे, नकाब हो गई हो।

तुम ही दीपिका की 
अदा में बसी हो 
डिंपल की उसकी 
हंसी में छुपी हो 
तुम ही कंगना की 
aggressive सतह हो
तुम ही तापसी की
ecstatic नज़र हो,
तुम ही कृति की 
आवारापन हो,
किआरा कि तुम ही
कुंवारापन हो,
तुम्ही खेलती हो 
दिशा–सी tease करके,
तुम ही बोलती हो 
राधिका–सी खुलकर,संभल के,

तुम मेरी कामना की, सूत्रधार हो गई हो।

Thursday, 11 March 2021

छोटी कविता

छोटा कमरा,
बंद कमरा
वक्त का पता
न जल न भोजन

करते-करते नंबर–नंबर 
बातें,आदत, सीधी–कमर,
भूल गए धरती और अंबर

भूल गए चिड़ियां
भूल गए कोयल
पशु–पक्षी,घास
पेड़ और छाव

सब भूल गए,

वह सोचते घुटनों से,
मैं लिखता कलम से 
अपनी 2 मिनट की छोटी कविता 
जैसे Oppenheimer की गीता।

Saturday, 13 February 2021

सत्यजीत

धैर्य वाला सत्यजीत 
सत्य वाला धीरज 
भाव वाला सत्यजीत 
बिना भाव धीरज 

सत्यजीत महारथी 
कर्ण वाला धीरज 
धीरज वाला प्यार 
सत्यजीत वाला व्यवहार 
नौकरी वाला सत्य 
तैयारी वाला धैर्य ।

हंसने वाली रोना 
रोने वाला सत्य,
सत्य की रोना 
या धीरज धरती रोना
रोना ही जाने सत्य !

सत्य का रोने में धैर्य,
धीरज का सत्य के लिए रोना 
या रोना का धैर्य के पहले रोना
कौन है पात्र-प्रेमी ?

धैर्य धरो, सत्य !
सत्य धरो, धीरज !
हमको हो रोना, 
तुमको हो रोना 
हमारी है रोना
तुम्हारी है रोना।

Saturday, 6 February 2021

नमस्ते

सब हंसते हैं 
जब कहते हो-नमस्कार !
तुम झुक करके,

सब हंसते हैं 
जब बहलाते हो
बातें मीठी,
कर करके 

सब हंसते हैं,
सरल बात को 
सरल शब्द में कहते हो,

सब हंसते हैं,
जब चिल्लाती हूं
तुम शांत मुस्कुरा सुनते हो,

सबका हंसना है-तिरस्कार 
हो बात तुम्हारी नम्र भले,
जग को देखा तो प्यार किया 
तुम जग से आगे क्यों निकले ?

बापू के आदर्शो पर 
चलना कैसे सीख गए ?
चिल्लाने वाली लड़की को 
तुम कैसे सहना सीख गए ?
Verbal abuse तो सहते थे,
पर Emotional abuse 
से ढह क्यों गए?

अब लगते हो बहुत पुराने 
मेरे भाव को नहीं बने,
कहती हूं मैं रोना तुमको 
टाटा,बाय-बाय, नमस्ते !

Tuesday, 2 February 2021

Literature वाली

तुमको कहूं
किस शब्द में,
कि शब्द संकरे पड़ गए 
तुम निकालो खोट उसमें,
जो खोजने ही में,
दिन हजारों लग गए। 

पर तुम निरंतर ढूंढती हो 
शब्द मेरी बात मे
भाव के विन्यास मे।

की हो गई हो
तुम परस्पर 
अपने ही अंदाज मे-
Literature वाली।

ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...