Sunday, 13 June 2021

चरित्र

जब कहा था तो,
तुम थी नहीं वो, 
जो मै था।

मै था जो,
होने के लिए मजबूर 
अपनी समझ से नासमझ 
नासमझी से मगरूर।

अब बना लिया है वह 
की जो थी तुम,
समझ की सीमा में रहकर,
तो तुम हो गई हो वही 
जो मै था।

वही कर रही
जो मै करा,
वही पाने के लिए
जो मै चाहता था,
वह बेचकर, 
जिसे मैं ढूंढता था।

वह मिल जाए मुझे तो, 
मै ना ढूंढूं तुम्हे, 
वही तुम अपना लोगी,
एक बार,
मिल जाए तो तुम्हें, 
जो तुम ढूंढती हो।

रोना

तुम गिराती टेसुओं को,
खूब समझकर-जानकर,
तुम अंधेरों में गिनाती, 
प्यार का एहसान कर,
पर क्या समझती कीमतें भी 
आंसुओं की गाल पर ?

बांट देती प्रेमियों को
कला और विज्ञान पर,
वह कलह से दूर हटते,
दोष देती ज्ञान पर।

पर जानती हो राहते हैं,
प्रेम पर संसार पर।

lifestyle diseases

यह लो बैठो,
और सोचो,
कुछ ना करो, 
तुमको नई व्याधि,
तुम खुद चुनो। 

मधुमेह है, गठिया है,
अस्थमा है और अनिद्रा है।

कुछ ना करो, चिल्लाओ,
तुनक-मिजाजी बन जाओ,
दवा खाओ, दवा खाओ।

योगाभ्यास मत करो,
मत खेलो, बस खाओ,
Bibimbap, मांस-मछली,
खूब-खूब चिचोरो।

पैसे लुटाओ, 
भर्ती हो जाओ,
खून चढ़ाओ, 
एक IV चढाओ, 
फिर भाग जाओ, 
फिर आओ।

थक जाओ,लेट जाओ, 
बीमार रहो और फैलाओ, 
नए दौर की नई बीमारियां, 
तुम इच्छानुसार अपनाओ।

मधुलता

मधु की बेली,
फूलों और लताओं संग,
ढक लेती, कुम्हलाती धरती।

बिखराती सुगंध,
लुटाती मकरंद,
मधुकर और खग, 
आते और पाते आनंद 
जब तल्लीन होकर 
तुम करती कोई काम अभंग।

तुम दीदी, तुम मां,
तुम प्रकृति तरंग,
तुम बांसुरी, तुम मृदंग,
तुम तांडव,तुम बसंत,
तुम हवा और लहर।

तुम तुलसी, तुम मीरा,
तुम राम और रंग,
तुम हो विवेक तुम आनंद,
तुम धनंजय, तुम पार्थ, 
तुम सिया की वाटिका,
तुम पंचवटी, तुम सत्संग,
तुम करती जब काम अभंग।

अहम् से आत्म

अहम्  मुझमे है,
अहम् उसमे हैं,
अहम् बना है,
अहम् रहेगा।

अहम् बचायेगा,
अहम् से अहम् को,
उगम से अगम तक।

पर आत्म हम हैं 
उसका आत्म नहीं,
नहीं मेरा,
नहीं किसी का,
वह था, है और रहेगा 
वह न जीया है न मरेगा !

वह बचेगा क्यूं?
जब नहीं बचेगा,
तो बचाएगा क्यूं?
 
अहम् की लाठी
और आत्म का लक्ष्य,
साथ चलते रहो,
अहम् से आत्म की ओर!

Tuesday, 25 May 2021

रोना Test

खुश कर देती उनको
उनका कहकर swag,
वह जब बातें करते 
तुम तब करती observe,
तुम अपनी बातों से 
लेती mental swab, 
वो क्या कहते, क्या सुनते, 
और क्या सोचते 
तुम परखती,
सबको ही करती judge 
बिना जाने पूरा सच,
बनाती negative या 
फिर positive 
तुम घुस के अपनी lab.

Report तुम देती 
प्रियांका दी को जाकर,
सारे लक्षण सक्षर
प्रियांका दी को समझाकर,
गुस्से मे लाल होकर 
तुम बताती फिर व्यवहार।

और इलाज मे करती 
emotional अत्याचार,
रोगी ही न जाने 
diagnose कब हुआ था?
दवा कब चली थी?
इलाज कब हुआ था? 
वह बैठा guilt मे
अपना धीरज खोता,

राम जाने कौन फिर 
भला negative होता 
कौन positive होता? 

कौन पास करता,
कौन फेल होता 
ये रोना test?

चूहा

चूहा कूतर रहा था,
कपड़ा, सोफा,
रस्सी,रोटी।
चूहा कूतर रहा है,
अब अपनी 
पूंछ की बोटी।

चूहा तो चूहा है, 
इंसान तो नही,
इंसान तो इंसान है,
चूहा तो नही।

Monday, 24 May 2021

आज़ाद

कुछ तो हम आजाद हैं, 
कुछ और किनारे बाकी हैं।

कुछ थालियों में खा चुके,
कुछ बैठ चुके छांवो में,
कुछ घरों में रह चुके 
कुछ दिल में रहना बाकी है।

हम बातें करते बिस्तर पर, 
हम बातें करते राम पर, 
हम साथ देखते जाति को, 
हम हाथ बटाते बच्चों पर,

उन पढ़ने वाली बातों को
अब मन में गढ़ना बाकी है।

Sunday, 23 May 2021

रात

रात भर तेरी याद
मुझको आती रही।

तुम जाती रही 
रात भर दूर मुझसे,
मुझे शिकवे सुनाती रही 
रात भर,
तुमसे चुप भी रहा और मनाता रहा,
तुमको खुद भी मुनासिब सुनाता रहा,
तुम न मानी मगर
मै बहुत ही समझाता रहा।

रात भर दिन की बात,
उभरती रही, 
रात भर दरवाजे तक बढ़ती रही 
रात भर, दिन की रोशनी ढूंढती, 
तुम उजाले से बिस्तर हटाती रही, 
मै न सोया, तुम न सोई, 
तुम मुझे रात भर यूं जगाती रही। 

मैने करवट ली, 
तो तुम नहीं थी बगल मे, 
तुम बगल में खड़ी बस मुझे 
हिलाती रही, डूलाती रही,
मै सोया तो था तुम्हे पाने के लिए 
तुम यही जानकर मुझे तिलमिलाती रही,
मेरे जीवन से जाना भर 
मुनासिब न था,
तुम सपनों से भी खुद को चुराती रही। 

मै जागा था जब रुखसत के लिए, 
जब समेटे थे कपड़े उस घर के लिए,
पूछा मैने कि घर है यह किसके लिए?
तुम तवज्जो लिए महटियाती रही। 

रोने लगी जब खुदा के लिए, 
तुम दामन को मेरे भिगाती रही, 
जो ना कहा, तुम गुमां मे रही, 
आंसू से मुझको बताती रही, 
राम को रात भर तुम जगाती रही,

रात भर तुम भी रोती रही,
रात भर तुम मुझे भी रूलाती रही।

भ्रम

मै भ्रम पालता हूं,
उसको देता विचार,
उसको देता समय, 
उसको रखता साथ-साथ 
उसमे रहता हर समय।

मै भ्रम की चिता जलाकर 
उसमे जलता दिन भर,
आत्मदाह मै करता,
पल-पल, हर पल।

भ्रम का धुँआ उठता,
मै गुर्राता, खीझ उठता,
अकुलाता,
मै भ्रम मे छुपकर 
आत्मा भुलाता,
मै भ्रम की चाहत मे
हीरा जन्म गंवाता।

मृग-मरीचिका मे 
चलते जाता, 
भ्रम मे रहता 
भ्रम फैलाता

मै भ्रम पालता।

Saturday, 22 May 2021

Characterless

तुम बता-बताकर 
बना-बनाकर,
मुंह को सबसे छुपा-छुपाकर 
रहती खुद के घेरे मे ही,
दोस्त मित्र को भगा-भगाकर।

गाली देकर डरा-डराकर,
कुछ लोगों को दबा-दबाकर,
लिपट-लिपटकर
रुला-रुलाकर।

फोन उठाकर
गढ़ती कहानियां,
टेसू अपने बहा-बहाकर 
डॉक्टर को भी,
सत्य को भी,
सबको गंदा दिखा-दिखाकर,
कीचड़ उनपर मसल-मसलकर,
करती उनका चरित्र तुम धूमिल,
अपना character,
गिरा-गिराकर।

राम-राम का मंतर जपती,
सीता सबकी चुरा-चुराकर।

ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...