Tuesday, 15 February 2022

Toxic–Ex

बातें करूं जो 
तुमसे मै छुपकर
तो बातें पुरानी वो 
याद आएंगी,

बातें करूं तुमसे
बदलकर तो भी
उसी मे मै
ढल जाऊंगी,

बातें रूमानी–सी
बातें रूहानी–सी
अब इस घड़ी मे
ज़हर बन गई हैं,

कस्मों की, वादों की
बातें जानी पहचानी–सी
जीवन की मेरी
खलिश बन गई हैं,

गुर्बत मे चुनी 
जो थी राहें सुकून की
वही अब तो मेरी
 तपिश बन गई हैं,

बंधन है मेरे
ठहरे कदम की
हिजाब ही मेरी
सकल बन गई है।


Police

सूर्पनखा ने राम को
रावण से बचा लिया,
उसने अपने प्रेम
ध्यान से छुपा लिया,
और भड़कते ज्वाल को
माता पर घुमा दिया,

बता दिया की है एक परी
दिव्य रूप–सी
है पंचवटी के महल मे
किरण ज्योति–मूर्त सी,

है नहीं उसके समान रूप
तीनों लोक मे
रावण के ही वो योग्य है
सर्वशक्तिमान योग मे,

यही कहकर सूर्पनखा ने
बात को घुमा दिया
अपनी काली खोट को
लखन–राम का दिखा दिया
सुर्पनखा ने राम को
रावण से बचा लिया,
सूर्पनखा ने राम को
पुलिस से बचा लिया।

चिट्ठी

तब तुम मुझे 
एक चिट्ठी लिखोगी,
मेरी कविताएं
जब फिर से पढ़ोगी,

उससे छुपोगी
उनसे छुपोगी
मेरा पता तुम
किसीसे पूछ लोगी,

मां की याद 
जब बहुत ही आएगी
आंसु पोछोगी खुद ही
और मुस्कुराओगी
फिर क्या सोचकर
तुम आगे बढ़ोगी?

तुम नही रोक पाओगी
अपनी कलम को,
महलों के मीनारों की
जद्दो–जेहद को,
गंगा किनारे की
रेती उठाने,
तुम मीरा–सी बनकर
पैदल चलोगी,

तुम लिखोगी वो मंज़र
रेतों के किलों की,
तुम बातों की अपने 
फसाने लिखोगी,
तुम खुशी की महज़ एक
झलक याद कर
दामन को अपने
भिगोया करोगी।


Sunday, 13 February 2022

परी

कभी किया है तुमने क्या
परियों का इंतजार
रात–रात जागकर 
कुछ क्षण का ही दीदार

खाई कभी है गालियां
क्या आवाज़ सुनने को,
क्या की कभी है स्वप्न से
यलगार, करने को,

क्या हो रुके सांसों को थामे
अप्सराओं के लिए
क्या कभी प्रिय को भुलाकर
काम से लोलूप हुए,

क्या कभी चाही है माया
सत्य की चौखट खड़े,
क्या फिसल–सी भी गई है
वासना तुम्हारे लिए,

क्या चुप रहे हो जानने को
चिल्ला के वो क्या–क्या कहेगी,
क्या कभी उलझन पड़े हो
की आज वो किससे जले,

क्या कभी सीखा है कुछ भी
आम्रपाली से भला?
दरवाजे पर क्या लूट गए हो
भूलकर सारी कला?

क्या ही लेकर आए थे
और क्या लेकर जाओगे
क्या कभी आजमा लिया है
गीता की यह साधना,

माया की नगरी के दरवाजे
कभी क्या घूमे हो,
माया की उंगली पकड़कर
क्या समर से जूझे हो?

अच्छी बातें

अच्छी तुम्हारी बातें सारी
याद आती है,

जान तुम चली गई हो
दूर तब मुस्कुराती हैं,
तुम्हारी याद ही लबों
पे मेरे तैर जाती हैं,

बात उन दिनों की जो
चिल्ला के करती थी तुम,
अब गुस्सा नही मुस्कान
मेरे मन में लाती हैं,

तुम्हारी हरकतों पे 
जो कसे,
ताने थे मैंने तब
अब बन के वो उलाहना
मन को सताते हैं,

खीच लेता हाथ या
हो ही जाता चुप,
गुर्रा ही देता गैर
जब तुमको सताते हैं,

पर गैर बनकर अब
तुम्हारा बन रहा हूं जब
राम फिर क्यूं मुस्कुरा के
मन में आते है,
राम की महिमा की माया
क्यूं जताते हैं ?


नाक–कान

नाक–कान काटना क्यूं
चाहता है लखन
सूर्पनखा बहन का आज
क्यूं लखन, क्यूं लखन,

मान करता राम का
पर राम–सा नहीं है मन
सूर्पनखा की करे अवहेलना
लखन का तपन,

सूर्पनखा का था क्यूं
सीता माता से जलन
नाम भी नही उसे था
उनका सुनना भी पसंद,

झपट पड़ी वो बिल्ली–सी
बनी बहन
कचोटना वो चाहती थी
दिव्य–प्रीति और किरण,

मन की सुन विवेचना
काम मे व्यथित बदन
उछल–उछल के चल पड़ी
माता की कर उलाहना,

राम की तनिक हटी
मुस्कान का अनावरण
दंड देने खुखरी
बढ़ चले क्षणिक लखन,

नाक–कान काट कर
कर दिया बहुत जघन्य
पर हमेशा राम–सा
पड़े जो मन को सोचना
तो व्यर्थ है गांधी का बढ़कर
नाक–कान काटना
मन के भव में तैरकर
रावण सरीखा नोचना !



Monday, 7 February 2022

मोहल्ला

मेरे घर से दूर
एक मोहल्ला है मेरे जैसा
वहां भी होलिका
जलती है और
सजती है
महीने भर पहले,
वहां भी हैं मकान 
पास–पास और
छतों से जुड़े हुए,
वहां भी बच्चे मिलकर
अपनी होलियां जुटाते हैं
वहां भी घरौंदों के दिए
भोर मे उठाते हैं,

वहां भी बड़ों की दीवारें
बच्चे लांघकर चले जाते हैं,
वहां भी इरादों और चंचलता
मुंडेरे रोक नहीं पाते हैं,
वहां भी शाम को वो मिलने
बिन कहे ही आते हैं,
वहां भी नाम के बिना
वो कई खेल खेलने जाते हैं
वहां भी बच्चे रोते हुए घर जाते हैं
वहां भी पुचकारकर
मां के आंचल में सो जाते हैं,

वहां भी वही ललक है
किताबों की सिमटी जिल्द से
उखड़ी हुई हसरतों की,
वहां भी वही उफन है
गर्मी की चिलचिलाती 
धूप में बिगड़ने की,

मेरे घर से दूर
एक मोहल्ला है,
बच्चों का जो 
अब तक बड़ा नहीं हुआ,
मेरे घर से दूर
एक घर भी है मेरी तरह,
मेरे बचपन का घर
जो अब तक है बचा हुआ !

धूप

धूप मेरे साथ
मेरे साए की तरह
मेरी कंधों पर चढ़ी हुई
मेरे रहनुमा की तरह,

मखमली छुवन–सी है
नर्म हाथ यार का
मेरे सामने खिली हुई है
मुस्कान के खुमार की,

धूप तब रुकि नहीं
जब बैठकर मै सोचता
धूप तब बढ़ी नहीं 
जब चल रहा था मै यदा–कदा,

मेरे हर होशोहवास मे
धूप मेरे साथ थी
मै करता और रुका मगर
धूप सदाबहार थी,

धूप मुझे सेकने को बैठना
ही क्यों पड़ा
जब मेरे मुकाम पर
धूप भी था संग बढ़ा !

Thursday, 3 February 2022

बंधन

कुछ ज़रूरत थी मुझे
वो पा लिया कोशिश किया
और पाने के लिए मै
और भी भिड़ता रहा,
और बंधन में स्वयं ही
आप मै गिरता रहा।

सेतु

जो है वह भान नहीं
जो होगा उसका ज्ञान नहीं
है और होगा के मध्य मै
और मुझमे है संताप नहीं,

यह सरल नहीं है
होना और नहीं होना
करना और नहीं करना
पाना और नहीं पाना

उसकी चादर की 
रंगत देख,
अपना रंग छुपा लेना
यह सरल नहीं है
उसकी बातों का मैल भुला
अपनी वाणी मीठी रखना

बस राम नाम के चप्पू से
अपनों से द्वंद मिटा लेना
जो है और जो होगा
उसके अंतर सुलझा लेना
सरल यही है राम नाम
तुम राम नाम दोहरा लेना।



कबूतर

ये कबूतर 
मिट्टी खा रहा है,
या खा रहा है
कंकड़,
चल–चल कर
उठा रहा है
यह कबूतर
कीड़ा कोई 
या मिट्टी का कण।

यह कबूतर 
ढूंढ कैसे पा रहा है
कण–कण का कंचन,
यह कबूतर तृप्त है
फांकता है रज–कण,
मै ढूंढता हूं ताज कोई
वह पा रहा है अंतर।

ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...