Saturday, 12 March 2022

हया

लड़की बड़ी कब हो गई?

कब हया की ओढ़नी
वह ओढ़ कर अपनी
नज़र बचाने लग गई
दहलीज धर घर की,

पहनने लगी साड़ियां
जब पर्दों की तरह
खींचने पल्लु लगी
जब और भी खींचने,

जब सर और सीने
ढकने को लगी वह जूझने
वह जब लगी हो नज़र
औरों की बचाने, 
कोसने खुद को,

मार खाने और 
नहीं भी चिल्लाने,
प्रश्न को मन मे छुपाकर 
नजरों से ढूंढने 
अपने जैसी मार खाती,
तसल्ली उसी में करने,

डर के घरों में चूल्हे जलाती
और खुद साये से ही डरने,
लड़की शायद तब
बड़ी लगती है लगने,

नहीं है कोई उम्र 
की जिसको पार वो करले
तो कहे की अब वो 
बड़ी है बहुत लगने।


भगत सिंह


तुम थे नहीं अब तक
या तुमको भूल बैठे थे
हम थे तुम्हारे गांवों मे
नशे में चूर बैठे थे,

तुम थे तो था की है कोई
अब कौन ऐसा है,
जो जान भी दे दे खुशी से
कौन वैसा है,

तुम थे लड़े जिससे अभी तक
वो ही अभी तक था,
भगवा पहन, पगड़ी लगा
बस रूप बदला था,

आज फैला है उसी का
उजाला हर तरफ
जो दिया रौशन हुआ था
भगत बन शबब,

फिर जलाएंगे घरों मे
चूल्हे दोनो पहर,
फिर से खेतों मे उगेगी
सरसों, नहीं ज़हर,

अब झुकाएंगे सरों को
दरों पर नानकों के हम,
अब बचाएंगे युवा को
नशों की बेड़ियों से हम,

अब बनाएंगे नए अजीत
नए आज़ाद नए भगत।

Thursday, 10 March 2022

बातें

कुछ बात तुम्हारी और मेरी 
जो होनी थी वह नहीं हुई,
कुछ कहते–कहते मै रुक गया
कुछ गुस्से में तुम्हारी झुलस गई, 

कुछ बातें खुली किताबों की,
कुछ बातें फिल्मी गानों की, 
कुछ कॉलेज की नुक्कड़ के चर्चे
कुछ लाइब्रेरी अखबारों की,

कुछ होते हुए इलेक्शन पर
बस चाय की चुस्की ले लेते,
क्लास को bunk करके मिलते
और गले पे पुच्ची ले लेते,

तुम चल लेती दो कदम अगर
मधुबन मे, कदंब के छांव तले, 
कुछ बात पुरानी उठ जाती 
स्कूल के किस्से गड़े–पड़े,

तुम डर ना जाती लोगों से
समाज का पहरा ना होता,
तुम फोन की घंटी ना सुनती 
और वक्त तुम्हारा ना होता,
 
यमुना की छीटों से कुछ
होली खेल लिए होते,
पांव तुम्हारे भीग जाते
सांसें ज़रा उखड़ जाती,

तुम हाथ छुड़ा कर ना जाती
नजरें नीची, तन ढक करके
वह शाम हमारी ना ढलती
जो सोए थे मुँह ढक कर के,

मैं बस से जरा उतर जाता
और दोस्त मेरे वो ना होते,
हम Domino's को छोड़ ज़रा
Movie मे समय लगा लेते,

कुछ पींगे अपनी बढ़ जाती 
कुछ किस्से अपने बन जाते
जो जलन तुम्हारी ना बढ़ती
आवाज तुम्हारी नम रहती,

परीक्षा मेरी नहीं होती
मैं झूठ को बहुत बढाता ना 
समय पे माफी मांग के मै 
तुमसे बहुत छुपाता ना

तुम डरी हुई सी ना रहती
मै डरा हुआ सा ना रहता
मै प्रेम को तुम्हें दिखा पाता
तू सब कुछ मुझे बता पाती,

कुछ बातें अपनी और होती
कुछ किस्से अपने और होते।

Sunday, 6 March 2022

शोर

ये शोर है शरीर का
ये शोर नहीं राम का
ये शोर बस समय का है
ये शोर नहीं काम का,

ये शोर ओमकार हैं
ये शोर अंधकार है
ये शोर व्यर्थ का बहुत
ये शोर है अनर्थ का,

सारा जोर कर्म का है
सारा काम कर्म का,
सारा नाम शोर मे है
नाम नहीं अर्थ का,

शोर–शोर ही रहे
और शोर बढ़ चले
शोर भी भला लगे 
जो नाम राम का रहे।

उड़ान

मैं उड़ जाता 
चिड़ियों के संग
मै पकड़–पकड़ के लाता,

मै उड़ने को अकुलाता
मैं उड़ता–उड़ता
उड़ ना पाता, 
उड़ने से डर जाता,

आतुर और सघन होकर 
चिल्लाता, उबियाता,
मैं पकड़–पकड़ कर लाता
उड़ता नहीं, न उड़ाता
डाली पर बैठता,
कुँक कोयलिया की 
मधुर–मधुर धुन,
गा–गाकर समझाता,

मै फिर–फिर उड़ता, 
मै पकड़–पकड़ कर लाता
मै राम-राम ही गाता।

नाटक

ये रोना झूठ–मुठ का है,
ये हंसना झूठ–मूठ का है,

हमे ख़बर भी नहीं
उनके ना होने की
दर्द का सहना
हमारा झूठ–मूठ का है,

कुछ बात नहीं बनती
तो उनकी याद आती है,
वरना याद भी करना 
हमारा झूठ–मूठ का है,

बातें कर रहें हैं हम
और से बहुत खुलकर,
उनकी राह भी तकना
हमारा झूठ–मूठ का है,

उनके चीख के किस्से
हमे तो याद हैं अब तक,
उनकी प्यार की आदत बताना
हमारा झूठ–मूठ का है,

उन्हें हम छोड़ आए थे
Metro के मुहाने तक,
उनकी राह तकने का बहाना
हमारा झूठ–मूठ का है,

उन्हें भुलाकर बैठे थे
शहर में जाकर उनके ही,
उनके ही लिए पढ़ना
हमारा झूठ–मूठ का था।

Friday, 4 March 2022

मातम

उनके जाने मातम 
करेंगे नहीं तो 
मुहब्बत बड़ी
नामुकम्मल लगेगी,

उनको तो मेरी
फिकर अब कहां है,
पर अधूरी मेरी कुछ
इबादत लगेगी,

क्या बोलेंगे
मुझे याद करके किसीसे
उनकी मेरी गर
हिकारत लगेगी,

अपने घुटन की
दुहाई वो देंगे
जब उन्हें मेरी उल्फत
सहादत लगेगी,

चाहतें गर न कहते
मातम को अपने
दुनियां को वो एक
तवायफ लगेगी,

उन्हें याद करना
नहीं चाहते हैं,
पर मातम न करें तो
बगावत लगेगी !

जाने भी दो

बचपना उनका है
उनको जाने भी दो,
किसी और की
अब हो जाने भी दो,

उनकी खुशी की 
इल्तज़ा करते थे,
कुबूल हो गई है
हो जाने भी दो,

हम तो पैमानों मे
समाते ही कहाँ थे,
मैखानों का लुप्त 
अब उठाने भी दो,

उनको नाज़ है अपने
खरीदारों पर,
उनको हुश्नों–जमाल
कुछ लुटाने भी दो,

लिहाफों पे पैबंद
आफताब का हो,
हिजाबों से ख्वाहिश
सजाने तो दो,

महलों मे वो 
नज़रबंद हो गए हैं
उनको दुनिया से
नज़रें चुराने भी दो,

कल को आयेंगे शहर मेरे 
मुझे ढूंढते हुए,
उनको पता मेरा
भूल जाने भी दो,

लिख लो दिल की कलम से
अफसाने मुहब्बत के,
महफिलें गैर की
सजाने भी दो,

वो मुकर्रर करेंगे
मेरे नाम को,
कुछ और वक्त
बीत जाने भी दो।

Thursday, 3 March 2022

शिर्क

अलविदा कहकर मुझको,
अब रोने भी न दोगे,
खुद तो सोते हो किसी की
महफूज़ बाहों में,
मुझे कोतवाली भेजकर
अब घर में सोने भी न दोगे,

मुझे दुखी करने की 
अदा ये तुम्हारी है,
अब किसी और की
मुझको होने भी न दोगे,
मुझे किरण चाहिए
एक उम्मीद तिनके की,
मुनासिब तुमसे बन सके
उतना होने भी न दोगे,

मुझको गाफिल रखा
तुमने कुफ्र होने तक,
अब मुंह मोड़कर
सब्र खोने भी न दोगे,
तुम शिर्क बन गए हो
ये मालूम था मुझे,
पता ये ही नहीं था
की हम दोनो ही न थे,

अपने शितम से जब 
तौबा करोगे तुम,
मुझे याद करोगे
जिक्र होने नहीं दोगे,
नाम मेरा लोगे 
जब रकीब के घर मे,
बेआबरू करके 
मेरी इबादत को,
मै जानता हूं
तुम मुझे जीने नही दोगे,

ये खलिश छोड़कर
जो बेखयाल हो गए,
तुम अपने गमों का
ईल्म होने भी न दोगे,
परवरदिगार से पर मै
दुआ ये करूंगा,
मेरी जान को खुदा 
कभी रोने नहीं दोगे।

सुर्पनखा के राम

सुर्पनखा ने राम
को चमकता देखा,
पर्ण–कुटी मे
दुखों से लिपटा देखा,

देखा जो उसने 
भोग की वस्तु 
समझकर के,
देखा जो उसने
काम की वृत्ति
में पड़कर के,

उसने कहा
निकाल लूं मै,
स्वर्ण के
इस रूप को
उठा लूं मै,
फूल की खुशबू
वनों मे
व्यर्थ होती है,
इत्र करके
महल मे
फैला दूं मै,

दर्द मे व्यथित हैं 
जग के, दीन के बंधु,
आज माया 
कि लहर मे
उनको डुबा दूं मै,

माया–लोपित प्राणी
राम को गद्दी चढ़ाता है,
सीता–सा हृदय मे
कौन उनको
अब बसाता है?

चमक से रघुनाथ की
सुर्पनखा भरमा गई,
राघव को वस्तु समझकर
काम से व्याकुल हुई,
प्रेम को मुख पर रखा
और आँख से ललचा गई,

प्रेम को पाने को वो
मुट्ठी समाने आ गई,
राम को पाने को मन के
राम से टकरा गई,
राम की प्यासी बहन
रावण को भी खा गई!

चुप्पी

तुम्हारी चुप्पी है
बोलने वाली,
कुछ मुँह दबाकर
हँसने वाली,
Phone करने वाली
मगर बस सुनने वाली,

बात को बस बोलकर
महटियाने वाली,
जानने से बची और
सुनाने वाली,

बात कल की 
दिल पे रखकर
सालने वाली,
माफ कहके
माफ नहीं
करने वाली,

तुम्हारी चुप्पी है
कल से कल को 
तोड़ने वाली !

ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...