Monday, 11 July 2016

तुम

तुझसे बातें करूँ
तुझसे मिन्नत करूँ,
तुझसे जिद्द भी करूँ
और बगावत भी,

कभी पलकों मे रखके
इबादत करूँ,
कभी नज़र मे चढ़ाकर
शिकायत भी,

तेरी मुस्कान पे
आयतें भी लिखूँ,
तेरी नादानियों पर
हिदायत भी,

तुझको उड़ने भी दुँ
आसमां के परे,
तुमको पल्कों मे
रक्खूँ छुपाकर भी,

तुम मेरी कोशिशों की
आफ़रीन हो,
तसव्वुर का मेरी
तुम ही आमीन हो,

तुम रिसती हो मेरे
पिघलने से ही,
मै उमड़ता हूँ
तेरे उभरने से ही,

तुम "तुम" हो नहीं 
तुम मैं ही तो हूँ ।।

Thursday, 13 August 2015

जुस्तजूं

दिल को होते हैं तुझसे गिले शिक़वे गम
क्यों ना तुझे मै पूरा जान लुँ !!

सजदा करूँ तुझको शाम-ओ-सहर
ख्वाबों मे देखूँ तुझे हर पहर,
रूमानियत में भी 
तेरी करूँ इल्तिज़ा,

क्यों न तुझको मै ऐसा खुदा मान लुँ ॥ 

हर नज़र में मेरी 
तेरा ही अक़्स हो,
बिन तेरे न कोई 
फिर मेरा शख़्स हो,

माएने ज़िन्दगी के
कुछ ऐसे मै,

तेरे मकसद मे होना फ़ना मान लूँ ॥ 

सौदा गर जो करू 
अपना बाज़ार में,
मेरी बोली लगे तेरे 
आसार मे,

उस मुवक्किल को 
अपनी मुक़द्दर मे मै,

क्यों न जन्नत का ही रहनुमा लुँ ॥ 


-धीरू 










Thursday, 2 May 2013

धीरज

पलकों मे कुछ स्वप्न लिए
जब साहिल पर तु आएगी, 
विस्तार देखकर सागर का
फिर मन ही मन घबराएगी

तब अपनी निर्दिष्ट सफलता पर
ऐ नाव ज़रा तु धीरज रख ।

अपनी धुन में रमा हुआ
जब नाविक तुझे निकालेगा,
जब ठहेरे पानी से खेकर
मझधार में तुमको तारेगा,

तब उसकी निश्छल मंशा पर
ऐ नाव ज़रा तु धीरज रख ।

जब तट पर करके प्रहार
तुझे वेग देगा मल्हार,
फिर धीमे से पीछे करके
जल को, देगा तुझको विस्तार,


तब उसकी अचल प्रबलता पर
ऐ नाव ज़रा
तु धीरज रख ।

छुट -मुट लहरों से मिलकर
जब तेरा मन उकसायेगा,
उन्मुक्त लहर से मिलने को
फिर तेरा मन ललचाएगा,

तब उसकी मंद कुशलता पर
ऐ नाव ज़रा तू धीरज रख । 

जब विलसित से मिल जायेंगे
कई बंधू तुझको राहों मे,
प्रेम-क्रीडा में मस्त कहीं
अल्हड़ सागर की बाँहों में,

तब अपनी व्याकुलता पर
ऐ नाव ज़रा तु धीरज रख ।


जब पहली बूँद मचलकर कुछ
तेरे मस्तक को चूमेगी,
लहरों की बाँहों से रिसकर
हर रोम में सिरहन झूमेगी,

तब अपनी उत्कंठा पर
ऐ नाव ज़रा
तु धीरज रख ।

इक बार अनंत के साए मे
तु बेसुध हो लहराएगी,
मदहोश किसी गहरायी मे
कई बार हिलोरे खाएगी, 

उन्मादों की उस सरिता में 
ऐ नाव ज़रा तु धीरज रख । 

जब तृप्त होकर अरमानों से 
निश्चल धारा मे ठहरेगी,
और यादों का उपहार लिये 
तु फिर से तट पर फेहरेगी,

तब तक नाविक झमता पर
ऐ नाव तु पूरा धीरज रख !!

Tuesday, 12 March 2013

एक मुस्कान

मुझे रास्ते में मिली,
एक प्यारी-सी  मुस्कान
ख़ुशी से लबरेज़,
एक भारी-सी मुस्कान
सुबह-सुबह खिली,
एक ताज़ी-सी मुस्कान ।


गुलाबी लबों में
बदन को सिमटती,
मोती के बिस्तर पर
करवट बदलती,
ख्वाबों को सँजोती
अलसाई-सी मुस्कान ।


आँखों से बहती
वो होंठों पर आई,
इठलाती-बलखाती
फिर चेहरे पर छाई,
मदहोशी में अंगड़ाई
एक भोली-सी मुस्कान ।


क्षितिज़ से उभरकर
फलक पर बिखरती,
कोरे दृगों मे
कई रंग भरती,
कुदरत मे पली
एक नयनाभिराम ।


निगाहों में कोई
कशिश-सी छुपाये,
ख़ामोशी से जैसे
ग़ज़ल कोई गाये,
किसी शायर की है
वो कलम की जुबां ।


कोई खुदगर्ज़ आदत,
कोई बिगड़ी-सी हरकत,
कोई बेख़ौफ फितरत,
कोई बेबाक हसरत,
परी लोक की
कोई नटखट शैतान |


कही कोई मंदिर की
गलियों से रिसती,
खुशबू जो हौले से
साँसों में बसती,
ज़न्नत दिखाती
एक पाकीज़ा एहसास ।


किसी रसिक भँवरे के
लबों पर पली-सी,
कचनार की एक
कमसिन कली-सी,
मय से भरी
एक मदहोश ज़ाम ।


अनजाने ही मेरे
लबों पे आ गई,
मेरे हृदय को
वो बहला गई,
रूक गया मै वहीं
मुस्कुराता रहा..
हर ग़म को मै
भुलाता रहा....


पल वो था रूका
मेरी आगोश मे,
न रहा मै भी उस
दरमियाँ होश मे
इक तसव्वुर मे
ख़ोया हुआ मै ज़रा
हर मंज़र को
मन में बसाता रहा ।


आँख झपकी मेरी , मै
संभल-सा चुका था,
मेरी गफ़लत में लम्हा
गुज़र सा चुका था,
पलभर का मंज़र
नज़र से मेरी,
दास्तां बनके दिल मे
उतर सा चुका था ।


कभी-कभी वापस
वो आ जाती है,
चेहरे पे फिर से
वो छा जाती है,
निराशा तिमिर में नई आश देती
अदिति-सी मुस्कान !!

Friday, 18 May 2012

देखा है तुम्हे.....

देखा है तुम्हे,
बेशक ख्वाबों में नहीं,
साकार देखा है,
कई बार देखा है,

कभी नज़रें चुराकर,
कभी बहाने  बनाकर,
हर बार नई  उमंग  के  साथ
खिलते  हुए  कई  रंग  के  साथ  |

कभी class के पीछे 
अपने बेंच को
स्याही से सींचते,
कभी उद्वेग कभी हर्ष और
कभी वक़्त को खींचते,
कभी हौले से मुस्काते,
खुद के ख्यालों में डूब जाते,
किसी आहट से सकुचाते,
अपने सुनहरे ख्वाब को
आँखों में छुपाते,
नज़रें चुराते,
बातें बनाते-फिराते |

कभी  बाग़  में,
सरसों के फूलों को सहलाते,
उनकी बालियों को घुमाते,
उन्हें बालों में लगाकर,
इतराते, बलखाते, शरमाते 
और  खिलखिलाते |

कभी  गुनगुनाते  देखा  है,
कोई नई-सी धुन,
ज़िन्दगी को लुभाते,
मुश्किलों को भूलते,
मिठास लिए हुए धुन,
सुरीली लय में बंधे हुए
इठलाते देखा है |

कभी सड़क पर देखा
बेफिक्र चलते हुए,
दंभ भरते  हुए,
गुलाबी लिबास में,
चंचल उल्लास में,
विचरते, टहलते 
और मचलते |

कभी group में,
सहेलियों से जुबान लड़ाते हुए,
झूठी बातें बनाते,
और  फिर  सच  बताकर  हँसाते,
किसी बात पर भौहें चढाते,
कभी  मुह बिचकाते,
कभी फुलाते,
कभी चिढाते, मनाते,
और कभी गुर्राते |

कभी प्रार्थना करते हुए
पलकों को हौले से उठाते,
चोर नजरें सभी पर घुमाते,
कभी व्यस्त पाकर सबको,
नजरें पूरी फैलाते,
दोस्तों को देखकर मुस्काते,
बातें बहुत-सी कह जाते |
किसी teacher की तरफ करते इशारे 
और फिर डर के सहम जाते,
कभी पकड़े जाने पर
शरमाते ,घबराते
पछताते और सर झुकाते |
फिर ध्यान से भगवन को
याद करते और मनाते,
अब  जपते हर बोल को,
विनय के हर मोल को
पहचानते ,स्वीकारते,
अब मानते और जानते |

कभी शाम को अकेले 
बैठे हुए,
ड्योढीयों पर क्यारियों के, 
हाथ रख कर डालियों पे,
छोटे पौधों को सवांरते,
तल्लीन हो कुछ सोचते,
दुविधा में डूबे हुए,
किसी व्यथा या नई कोई शरारत,
का हल ढूंढ़ते,
सजाते,बनाते या
शायद अपनाते,
देखा है तुम्हे..........

पर अब  ख्वाब लगता है,
बीते हुए कल का नज़ारा 
वो लम्हा जिसका हर पल 
था तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा ....

बेशक  नहीं  थे  तुम 
ख्वाबों में कभी,
पर  हमेशा  रहोगे,
मेरी यादों  में कहीं ...

 -धीरू


Sunday, 15 January 2012

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है....

कभी कभी मेरे दिल में 
ख्याल आता है,

की ज़िन्दगी गुज़र जाती यूँ 
उनके साथ चलते-चलते,
न शाम ढ़लती
किसी किनारे पर,
न रात रुकती किसी
सिरहाने पर,
बस उनकी मुस्कान
के सवेरे में मेरे
जज्बात पलते बढ़ते |

मेरी बाहों में वो
कुछ ऐसे पिघलते,
की न प्यास बुझती 
किसी पैमाने पर,
न मदहोशी थमती 
किसी मुहाने पर,
बस बह जाते दरिया
को पार करते-करते |


डूब जाते हम झील-सी 
आँखों में कुछ ऐसे,
की न साँसे ही रुकती
उसमे समाने पर,
और न धड़कने ही चलती 
अपने तराने पर,
बस गुज़र जाती ज़िन्दगी 
इक बार मरते-मरते |

कभी कभी मेरे दिल में ये ख़याल आता है......

ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...