Friday, 6 July 2018

भारत की बेटी


भारत की बेटी बड़ी हो रही है,
भारत की बेटी बड़ी हो गयी है....

वो घूम रही है गली और गली,
बनारस से बम्बई, बम्बई से दिल्ली,
भुवनेश्वर से Columbia,
Columbia से andaman और Nicobar,
वह देख रही है Picture, ट्रेन में बैठकर,
एक के बाद एक, दो और दो चार,
मुस्कुरा भी रही है,
boyfriends की line लगाकर,
रुपये के बूतों के,रिश्ते ठुकराकर...

हया को वो ठेंगा दिखा जो रही है,
वो बेटी बड़ी बेहया हो गयी है।

वो पढ़ रही है कॉलेज में जाकर,
पहुँच जाती है ख़ुद ही scooty चलाकर,
भरे है उसने JRf के पर्चे,
उठाने लगी है ख़ुद के वो ख़र्चे,
Tuition पढ़ाती है, coaching चलाती है,
आजकल वो पैसे,
सिर्फ़ कमाने के लिए भी कमाती है,
घूमने जाती है और घूमाती है,
पैसे उड़ा के वो भी ख़ुश हो जाती है,
वो phd करने से ख़ुश हो रही है,
अपनी गाइड भी वो ख़ुद चुन रही है,

पढ़ने, कमाने वो जा जो रही है,
वो बेटी बड़ी बेपरवाह हो गयी है।

वो करने लगी है राजनीति के चर्चे,
समंदर में गाड़े हैं उसने भी झंडे,
Cricket खेलती है फ़िरंगी से जाकर,
हारकर भी पाती है, दिलों के वो medal,
Olympics में लायी कई सारे पदक,
वो योग और स्वच्छता की बनी है ambassador,
TheHindu में लिखने लगी है article,
और tv पे aati है prime time लेकर,
रक्षा और विदेश की नीति बनाकर,
वो करती है बातें सबको चुप कराकर,

वो आयी जो माथे पे चंदन लगाकर,
वो बेटी ना जाने क्या-क्या कर गयी है।

वो करती है जूडो, करती कराटे,
करती है पेंटिंग, करती theatre,
वो गाने भी गाती है, वो है youtuber,
वो सुनती है बातें, है वो motivator,
जिस्म ही नहीं बेचती वो सिनेमा पर,
लिखे जाने लगे हैं, उसपर भी character,
Barbie मे भी आए हैं उसके रोल multiple,
वो घर भी बनाती है, भाई से बढ़कर,
वो हँसाने लगी है, बतियाने लगी है,
समझदार हो गई है, फ़ोन उठाती निडर,

जो ख़ुद को है समझा, उसने कई दिनों पर,
वो लक्ष्मी स्वयं शारदा हो गयी है।

पर हैं कुछ अभी भी, परदों में छुपकर,
बस जी लेती हैं जो किसिकी पत्नी ही सजकर,
पिता के कहे पर कोई form भरकर,
ज़माने की नज़रों से इज़्ज़त बचाकर,
पढ़ती अंधेरों मे, कुछ रोशनी चुराकर,
लड़ती हुई एक दूसरे से जलकर,
कुछ पित्रिसत्ता के टुकड़ों पर झपटकर,
अपने सपनों पर उसका मरहम लगाकर,

क्या उनको देगी सहारा ये बेटी, हाथ बढ़ाकर ?
ख़ुशियों को दिखाकर, दुखों को भुलाकर ?

क्या इतना वो बेटी खड़ी हो गयी है ?
क्या भारत की बेटी सचमुच बड़ी हो गयी है ?








Wednesday, 23 May 2018

Rape

"आशाराम को सज़ा हो गयी !"
वो चहक गयी यह कहकर,
"चलो किसी दरिंदे को सज़ा मिली !"
बोली वो अख़बार पढ़कर।

भारत आज आगे बढ़ा है,
यह समझकर,

वह बोली,
"उसने सोचा होगा क्या
कैसे अकेले पाकर,
दबोचा होगा कहीं
अकेले में ले जाकर,
आँखें तरेरी होगी
चेहरे को लाल-कर,
जकड़ लिया होगा
उसको डराकर,
चुप करा दिया होगा
उसको चिल्लाकर।

और वो अबला,
सिहर गयी होगी
सच जानकर,
छटपटायी होगी कुछ
ताक़त लगाकर,
माँ को ढूँढती हुयी
झाँकी होगी बाहर,
पुकारा होगा 'मम्मी ऽ ऽऽऽऽऽऽ'
शायद घबराकर

किंतु रुका होगा वो
अपनी ताक़त आज़माकर,
शांत हुआ होगा
अपने अहम् को बढ़ाकर।"

"महफ़ूज़ रखा मुझको
घर में छुपाकर,
बचपन में ही योनि से
परिचय कराकर,
हर हरकत पे
मुझको ही 'रंडी' बताकर,
झपटकर, डपटकर,
धमकाकर,डराकर,
मेरे पिता ने मुझे
दुनिया से बचाकर।

मै नहाती भी नहीं हूँ
पूरे कपड़े उतारकर,
जो सर दर्द होता
कभी भी भयंकर,
खा लेती हूँ एक साथ
Painkiller दो चार,
पढ़ने भी जाती
नहीं हूँ मै बाहर,
नहीं हूँ 'उन'
लड़कियों जैसी फक्कड़,
इसलिए नहीं होगा मेरा
Rape भी कभी कर।"

बता ही रही थी यह
मुझे वो phone पर,
की आवाज़ आयी
"सावित्री ! बेटी आओ इधर"
Phone काटा उसने
डरकर, सम्भलकर !

एक हल्की-सी आवाज़
आयी थी रिसकर,
"हम्म ! मेरी बेटी वैसी नहीं है ! "
कहा ब्राह्मण ने
शायद, अख़बार पढ़कर।

Tuesday, 1 May 2018

गज़ल़

दिल के हैं अच्छे लेकिन, बुरा भी तो करते हैं।

Auto मे या metro मे,फ़ोन मिलाकर वो,
बातें भी तो करते हैं,हँसने भी तो लगते हैं।

फ़ुर्सत मे वो बैठे हों और फ़ोन मै कर दूँ तो,
थकने भी तो लगते हैं,सोने भी तो लगते हैं।

नाराज़ हों हमसे वो,तारीफ़ मै कर दूँ तो,
झपटने भी तो लगते हैं,लड़ने भी तो लगते हैं।

मन से उनको निकालूँ अगर,कविताओं में मेरी,
आने भी तो लगते हैं, बसने भी तो लगते हैं।

परेशान वो बैठें हों, और याद मै कर लूँ तो,
रोने भी तो लगते हैं,सम्भलने भी तो लगते हैं।

होली पर उनको मै, रंग लगा दूँ तो,
घुलने भी तो लगते हैं,मिलने भी तो लगते हैं।

ग़ुस्से में अगर आकर,ना फ़ोन उठाऊँ तो,
Telegram पे भी आते हैं, whatsapp भी तो करते हैं।

छुपकर मिलने पर,अॉंखों से मेरी रिसकर,
बाहों मे पिघलकर,सासों मे बसने भी तो लगते हैं।

कस्मे-वादों पर जब बात हो हिम्मत की,
डरने भी तो लगते हैं,हटने भी तो लगते हैं।

ज़ुबान से अकसर, सुनते ही नहीं जो,ब्लाग पे आकर वो,
पढ़ने भी तो लगते हैं,समझने भी तो लगते हैं।

दिल के हैं अच्छे लेकिन, बुरा भी तो करते हैं।

Friday, 6 April 2018

मीठी-मिशरी

काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।

न होती तुम्हारी
आवाज़ मीठी,
न होता तुम्हारा
अंदाज़ बचपन,

होती तुम्हारी भी
बातों मे अईठन,
बिगड़ जाती तुम भी
हर बात, हर क्षण,

मन मे तुम्हारे भी
वीषाद होता,
थोड़ा-सा तुममे भी
अभिमान होता,

तुम मेरे ज़ेहन मे यूँ उतरी ना होती।
काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।।

नाक पर तुम्हारे
दो तिल ना होते,
होंठों की पतली
सुराही ना होती,

मै बाहों मे लेकर
तुम्हे चुम लेता,
और दुनिया मे कोई
तबाही ना होती,

मेरे मुहब्बत को तस्लीम मिलती, बाज़ार मे उसकी तफ़री ना होती।
काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।।

आँखों मे झूठा-सा
ग़ुस्सा ना होता,
मै तुम्हारी ढ़लती शामों का
हिस्सा ना होता,

तुम स्कूल से आकर
मेरी गोद मे ना सोती,
मै सहलाता ना सर
कोई किस्सा ना होता,

तो फिर तुमसे दूरी यूँ अखरी ना होती।
काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।।

ना करते परीक्षा
पढ़ाई की बातें,
कवितायें मेरी
ना किसीकी सुनाते,

न गाँधी,अहिंसा,
न 'गीता' की बातें,
न महिला,न बेब़स,
न बँटती सरहदें,

मेरी समझ इतनी गहरी ना होती।
काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।।

ना दिवाली के दिये
मेरे संग सजाती,
न होली अकेले
मेरे संग मनाती,

ना रामचरित,
ना 'दिनकर', ना 'बच्चन',
ना मै पढ़ सुनाता
ना तुम गुनगुनाती,

तो मेरी ज़ुबाँ भी यूँ फिसली ना होती।
काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।।

रातों मे मेसेज से
बातें ना होती,
जो सच मै न कहता
तुम झुठ ना दुहराती,

ना बीमारियों पे
कोई मलहम लगाते,
ना शामें सुबकतीं
ना रातों मनाते,

तो 'पम्मी' भी कोई लड़की ना होती।
काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।।

ना खाना बनाती
मेरे संग दुपहर,
ना ही परागु
ना ही कोई मधुकर,

इन ज़ायक़ों से वाक़िफ़ यूँ ऊँगली ना होती।
काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।।

Thursday, 8 March 2018

निष्ठुर

ढलती हुयी निशा को,
प्रकाश निष्ठुर है,
उफ़नती हुई घटा को,
बरसात निष्ठुर है,
फैली हुई दिशा को,
आकाश निष्ठुर है,
उभरी हुयी ऊषा को,
अंगार निष्ठुर है ।

मन की तरंग को तो,
अल्फ़ाश निष्ठुर है,
निर्गुण हुए ख़ुदा को,
साकार निष्ठुर है,
चढ़ते हुए नशे को,
आभास निष्ठुर है,
मेरे अन्त:करण को,
भ्रमजाल निष्ठुर है।

उसराती हुयी धरा को,
क्या बाढ़ निष्ठुर है ?
'बापू' के देश मे,
क्या 'मोदी-सरकार' निष्ठुर है ?
लिखते हुए प्रेमचंद को,
क्या आराम निष्ठुर है ?
खेलते हुए ध्यानचंद को,
कोई 'ज्ञान' निष्ठुर है ?

क्यूँ कर मेरी दुआ को,
इंकार निष्ठुर है ?
क्या तुम ही निष्ठुर हो ?
या की प्यार निष्ठुर है ?

ज़रूरी है,

कालचक्र की फिर से,
शुरुआत हो जाए,
किसी को अपनी सीमा का,
ज़रा एहसास हो जाए,
सृजन का फिर कहीं,
नव-रूप में आग़ाज़ हो जाए।

अतः ना तुम ही निष्ठुर हो,
ना ही प्यार निष्ठुर है ।।

Wednesday, 10 January 2018

तुम्हारे जैसी

कोई क्यूँ नहीं है, तुम्हारे जैसी ?

कोई क्यूँ नहीं ऐसी चंचल ?
जो आँखें भी दिखाती हो,
मुस्कुराती भी हो,
जो रूठ जाती हो,
फिर मान जाती हो,
जो मेरे रूठ जाने पर,
मुझे मनाती भी हो ?

कोई क्यूँ नहीं है इतनी ज़िद्दी ?
जो break-up करके,
बतियाती ना हो,
जो चली जाने पर,
फिर आती ना हो,
जो phone काट देती हो,
पर उठाती ना हो ?

कोई क्यूँ नहीं है, इतनी मेहनती ?
जो पढ़ती हो ख़ुद भी,
पढ़ाती भी हो,
मुझको तड़के सुबह ही,
जगाती भी हो,
और रात भर मुझसे,
बतियाती भी हो ?

क्यूँ नहीं कोई मेरे आस-पास ?
जो मेरे class मे हो,
मेरी जाति मे हो,
जिसके सपने भी हों,
और दिखाती भी हो,
जो राम नाम ले,
और निभाती भी हो ?

है क्या तुम्हारे जैसा कोई ?
जिसको चूमने का दिल करे,
और वो इतराती ना हो,
Cinema मे कोने की सीट पर,
जो मेरे साथ मे घबराती ना हो,
जो मुझसे प्रेम भी करे और
डर भी जाती ना हो,
जिसके 'ऊपर' लिखूँ मै कविता कोई,
वो पढ़ती भी हो तो मिटाती ना हो ?

Monday, 1 January 2018

आज़ादी

मैंने आज आज़ादी देखी,

खुली आँखों की आज़ादी,
चेहरा छुपाती हुई आज़ादी,

साइकिल चलाती हुई,
Scooty चलाती हुई,
पढ़ने जाती हुई,
उड़ने जाती हुई,
पर ख़ुद के लिए, ख़ुद को,
ख़ुद से छुपाती हुई,

बोलने की नहीं, मैने
सिर्फ़ देखने की आज़ादी देखी ll

मैंने आज आज़ादी देखी,

रसोई की आज़ादी,
पकाने की आज़ादी,

पूड़ियाँ बेलती हुई,
सब्ज़ी गरमाती हुई,
खीर बनाती हुई,
परोसती हुई, खिलाती हुई,
पर क्या बनाना है खाने मे,
हर किसीसे, अलग से पूछती हुई,

सोचने की नहीं, मैने
सिर्फ़ करने की आज़ादी देखी ll

मैंने आज आज़ादी देखी,

सजी-धजी आज़ादी,
खिड़कियों से झाँकती आज़ादी,

किसी party मे आती या जाती हुई,
गहनों से लदी हुई,
आँखें विस्मय से खुली हुई,
पहली बार मोटरगाड़ी में बैठी हुई,
सड़के और महलें निहारती हुई,
हम कहाँ और क्यूँ जा रहें हैं,
अपने driver से ही जानती हुई,

फ़ैसला लेने की नहीं, मैने
सिर्फ़ बैठने की आज़ादी देखी ll

मैंने आज आज़ादी देखी,

Jeans पहने आज़ादी,
दारू पीती आज़ादी,

Make-up मे गढ़ी हुई,
ऊँची heel पर चढ़ी हुई,
Cleavage दिखाती हुई,
कमर से लुभाती हुई,
भीड़ को ही ढूँढती,
भीड़ से ही खीझती हुई,

जीने की नहीं, मैने
सिर्फ़ जी लेने की आज़ादी देखी ll

पंडित की बड़ी बेटी

कोई चिल्लाता है तो सहम सी जाती है,
हिंसा को जब इतना क़रीब वो पाती है,
निगाहें झुकाती है,कुछ समझ नही पाती है,
जब कोई बात उसके दिल पे लग जाती है,
बस धीरे से सुबकती है, आँखें भिगो लेती है,
कभी बहुत गुस्से मे होती है, तो बस रो देती है.....

बड़ी अदब है उसमे, वो ज़ुबान नहीं लड़ाती है......

छोटे भाई को खाना खिलाती है,
घर को सजाती है, पोछा लगती है,
पौधों से बालकनी को सजाती है,
पापा जी को पानी, हर बार वही पिलाती है,
कपड़े उनके धोकर, वही चमकाती है,
खाने के लिए वही सबको बुलाती है,
ग़ुस्सा होती है कभी-कभी
आँखें दिखाती, डराती है, फिर मुस्कुराती है,

माँ के जैसी है वो, माँ से ज़्यादा बन जाती है.....

Scooty लेकर वो निकल जाती है,
माँ का इलाज कराती है,घर का सामान लाती है,
भाई को दवा,बहन को किताब दिलाती है,
किसी को सुबह की ट्रेन पकड़वाती है,
या फिर किसी को मंदिर के दर्शन कराती है,
वह अपने पिता की 'बेटा' कहलाती है,
पर उसके पंखों को बचपन मे, क़तरा गया है,
वह ज़्यादा दूर तक उड़ नहीं पाती है,

वह ज़िम्मेदारियाँ उठाकर भी,समाज मे 'आवारा' ही कहलाती है......

लोग कहते हैं, उसको maths नहीं आता,

ना जाने वो भाई के लिए पैसे कैसे बचाती है ?
उसकी coaching का ख़र्च चलाती है,
जन्मदिन पर उसके मनचाहा गिफ़्ट लाती है,
भाई के टूटे दिल को कैसे जोड़ पाती है ?
उसकी girlfriend से setting कराती है,
कभी रूठ जाए वो, तो वो ही मनाती है,

वो इतना 'reasoning' जाने कैसे समझ जाती है ?

इन सब के बीच उसका अपना भी जीवन है,

वो जिसे खुलकर जी नहीं पाती है,
अपने प्यार को वो, सबसे छुपाती है,
उसको अभी तक, इक गुनाह ही बताती है,
उसका फ़ोन silent पे ही रहता है,
वो किसी को नहीं जताती है,
अपने 'उनसे' भी वो अकेले मे बतियाती है,
सारे ख़ानदान की 'इज़्ज़त' आख़िर वही तो 'उठाती' है,
वो खुलकर नहीं हँसती, 'ठहाके' शायद ही लगाती है,
दुपट्टा सरक ना जाए कंधे से, इसलिये,
बहुत हो जाए तो वो, केवल मुस्कुराती है,

बड़ी अदब है उसमे, वह दाँत नहीं दिखाती है....

उसको शादी के लिए हर बार कोई देखने आता है,
दहेज और सुंदरता के बीच उसकी बोली लगता है,
कोई height तो face-cutting का नुक़्स बताता है,
उसकी पढ़ाई-लिखाई हर कोई भुल-सा जाता है,
कोई दहेज देकर compromise करवाता है,
कोई beauty parlor लेजाकर उसका चेहरा जलाता है,
"भगवान" की ग़लतियाँ सुधरवाता है,
उसका चेहरा fair & lovely बनवाता है,
कोई studio लेजाकर bright फ़ोटो खिचवाता है,
कोई photoshop से edit करके चमकाता है,
कोई उम्र कम बताकर setting कराता है,
अंततः बस हर कोई reject करके चला जाता है,

वो हर बार थोड़ा-सा ग़ुस्सा दिखाकर,
नुमाइश के लिए तैयार हो जाती है,
चुपचाप फिर से reject हो जाती है,

बड़ी अदब है उसमे,
बड़ी बेटी सबकुछ बिना कहे समझ जाती है.....







Friday, 6 October 2017

शहर की हवा

ये जो तुम्हारा, नया-सा शहर है,
ये जो तुम्हारा, बड़ा-सा शहर है,
तुम्हारी दुआ को, रवा मिल गयी है,
तुमको शहर की, हवा लग गयी है।


तुम्हारे lipstick पे बुर्क़ा नहीं है,
आरज़ू मे तुम्हारी, गिला भी नहीं है,
तुम अपनी अदा से चिढ़ाने लगी हो,
तुममे कोई 'कंगना' बस गयी है,

तुमको शहर की हवा लग गयी है।

वक़्त-बेवक्त भी खाने लगी हो,
काँटे औ' चम्मच चलाने लगी हो,
अपने से खाना बनाने लगी हो,
तुमको liberating सज़ा मिल गयी है,

तुमको शहर की हवा लग गयी है।

यूँ ही घूमने को निकल जाती हो,
खेलती भी हो तुम और लड़के पटाती हो,
तुम्हारी घुटन ख़ुदख़ुशी कर रही है,
तुमको तो ख़ुद मे वजह मिल गयी है,

जैसे हसरत को मेरी, दुआ लग गयी है।
तुमको शहर की हवा लग गयी है।।

Tuesday, 3 October 2017

मुक्ति की आकांक्षा

चिड़िया को लाख समझाओ,
की पिंजरे के बाहर आओ,

पर वो कहेगी, 'नहीं!'
मैं यहीं पर हूँ सही।

मेरा पिंजरा, 'सोने का है !'
फिर काहे को रोने का है ?
यहाँ सभी सुख-चैन है,
AC, fridge, Cooler-fan है

यहाँ बैठे बिठाए खाना है,
बस एक चोंच ही हिलाना है,
हर बख़त पानी कटोरा है भरा,
मीठा स्वाद है उसका, बहुत ही सुनहरा!

पर बाहर तो ताज़े फल हैं
और 'सुमन' के दाने है,
पानी के झरनो मे घुलते
तुम्हारे कलरव-गाने हैं!

और खुली हवा की साँस है,
आज़ादी का अहसास है।
'नहीं ! बाहर ज़िंदगी बकवास है,
परीक्षा है हर घड़ी, हर दिन एक class है।

यहाँ छोटा-सा मेरा झूला है,
वो मेरा ख़ुद का अकेला है,
सीख़चो का पहरा कड़ा है,
नहीं जान का ख़तरा बड़ा है!

बाहर पेड़ की ऊँची फुलगियाँ है,
जहाँ से दिखती सारी दुनिया है,
डालियों पर फुदकना है,
सभी के संग चहकना है!

और तुम्हारा मन था उड़ने का,
किसी के साथ उड़ने का,
हाँ ! पर मेरे पिता का नहीं है,
और वो जो भी हैं, सही हैं।

उन्होंने ही तो उड़ना सिखाया था,
पंखों को खुलना सिखाया था,
आँधी-से, थपेड़ों-से जब डगमगायी,
थामकर ऊँगली, सम्भलना सिखाया था।

हाँ................! सिखाया तो था !

सीख नहीं पायी मै, उड़ने की कला
जो कुछ भी सीखा, बड़े धीमे से सीखा,
गा नहीं सकती कोई 'रामकली',
अदनी-सी चिड़ियाँ मै, नहीं 'श्यामकली !'

और.........
मेरा भाई भी तो है,
वो उड़ना जानता है,
वो उड़ेगा मेरी तरफ़ से.......

Saturday, 23 September 2017

क्या हुआ ?

क्यूँ फ़ोन किया था ?
कुछ कहना है ?
कुछ बताना है ?
कुछ पुछना है ?
कुछ जताना है ?

मै कुछ नया तो
करती नही,
तो उसी बात को
क्यूँ बार-बार दुहराना है ?

क्या करूँगी सुनकर,
तुम्हारी भी बातें ?
मुझे कौन- सा उसपे
थिसिस बनाना है ?

परीक्षा है मेरी,
मुझे पाठ दुहराना है।
कुछ बच्चों को शाम को,
ट्युशन पढ़ाना है।

कोई काम भी है मुझको,
थोड़ा बाहर भी जाना है।
आज छुट्टी है सबकी
वो अलग ही फ़साना है।

कल क्लास थोड़ी जल्दी है,
मुझे तड़के ही जाना है ।
आज भी बहुत काम था,
तो सोई नही हूँ,
उसका भी कोटा,
मुझे आज ही भूनाना है।

ख़ैर तूम्हे तो सब पता है
तो फिर क्या समझाना है ?

और कहो! क्या हुआ ?
तुम्हे कुछ सुनाना है ?

'नहीं! कुछ नहीं,
बस यूँ ही!'

ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...