Friday, 29 April 2022

भाव

किस भाव को चलने दें,
किस भाव को रोकें?
किस भाव को बढ़ने दें,
किस भाव को टोकें?
किस भाव की कीमत है,
किस भाव की सस्ती बात,
क्या भाव है क्या रात?
क्या भाव है आगे का,
क्या भाव है पीछे का?
किस भाव का गहरा घाव,
किस भाव का बड़का ताव?
क्या भाव मेरा है,
क्या भाव तुम्हारा है?
किस भाव मे राम हैं,
किस भाव में राम नहीं?

Thursday, 28 April 2022

AMR

ये किनके बच्चे हैं 
जो अधनंगे
घूम रहें हैं घाटों पर
इनको गुम होने का
नहीं है डर
घाट पर ही है
इनका घर
ये हंसते हैं,खेलते हैं 
और भटकते हैं इधर–उधर,
ये खाते हैं मिट्टी,
लोटते हैं ज़मीन पर
ये कर भी देते हैं,
इधर–उधर,तितर–बितर,
कौन साफ करता है इनको, 
कहां है इनका साफ–बिस्तर
पैर पोछकर बोरे मे
चढ़ जातें हों ये जिनपर,
वह गया ढूंढने था रोटी,
जो उठा लाया paracetamol
कूड़े मे हाथ अंदर कर,
रंग–बिरंगे,लाल–नीले,
छोटे–छोटे, हरे बटन
पानी खोज के पी लेगा
और बढ़ जायेगा AMR,

बापू के लगते है ये बच्चे,
अधनंगे फकीर, बेहद निडर
दुनिया के बच्चे हैं, 
अब तक हैं जो बेघर
अंबर की छतरी के नीचे, 
ये बच्चे कर्ज हैं भारत पर!

Wednesday, 27 April 2022

गुंजाइश

मिलने की तुमसे
हर घड़ी मै
गुज़ारिश ढूंढता हूं,
अपने दिल के
टूटने पर
जीते रहने की 
बिन तुम्हारे
ख्वाहिश ढूंढाता हूं

अब तुम्हारी आरजू की
अंजुमन मे बारिश ढूंढता हूं,
कतरा कतरा मै जुटाता
आंसुओं को
ख्वाब तेरे मै सजाता
उनमे खुद की गुंजाइश ढूंढता हूं

मै तुम्हारे लब पे अपनी
हर तमन्ना की लड़ाई
ज़र्रा ज़र्रा इस तड़प की
नुमाइश ढूंढता हूं

तुम ना कह दो
मै तुम्हारा हूं नहीं अब
इस फिकर मे
धूप मे खुद की मै
परछाई ढूंढता हूं 

मै बिखर कर 
गिर न जाऊं
धूल बनकर रास्तों पर
मै तुम्हारे दर्द डूबने को
गहराई ढूंढता हूं

मुझसे मिलने आ गई तो
हूं अकेला ही खड़ा मै
बच रहा हूं भीड़ से मै
अजनबी बनकर तुम्हारा
आने वाली तन्हाई ढूंढता हूं,

तुम भुलाओ प्यार को तो
मै संभल कर याद कर लूं,
कोई पूछे नाम लेकर
मै छुपाऊं, कुछ बताऊं
मै तुम्हारे नाम पर
देने वाली कर दुआएं
कर गुजरने के लिए
खुदा के दर पे दुहाई ढूंढता हूं।

Sunday, 24 April 2022

मना लेना

तुम उससे 
बात करने को
कुछ कहकर मना लेना,
मेरी कविता ही
अपने शब्द मे
पढ़कर सुना देना,

कुछ अखबार के चर्चों से
उसको मन बना लेना,
सरकार की बातों से
कोई तह सजा लेना,

कुछ पूछ लेना की 
पढ़ती आजकल क्या है?
Election कौन लड़ता है
लिखती आजकल क्या है?

कोई कविता जो उसकी हो
तो मुझको भेज देना तुम,
मै पढ़ता हूं बहुत कुछ अब
उससे मैसेज देना तुम,

मै “रोना” छोड़ चुका हूं अब
पते की बात करता हूं,
पंजाब को जीत आया हूं
मै अब गुजरात चलता हूं,
मुनासिब है नहीं की अब
कव्वाली इश्क की गाउं,
बसंती रंग लिया चोला
मै डांडी मार्च करता हूं,

पुरानी बात को भूले
भगत–बिस्मिल सरीखे हम,
बहुत–से पेट भूखे हैं
दिलों के हाल भूलें हम,
यहां मेहमान दो पल के
मुसाफिर बन के आए हैं,
जो जीवन छोड़ जाते हैं
कहां फिर रोक पाए हैं?😔

चिलबिल

चिलबिल की तितली
कितनी आसानी से
आ जाती हाथ मे,

गुच्छे दर गुच्छे
और मुट्ठियाँ भर जाती,
एक पत्थर की दरकार
फिर सारी उड़ जाती,
पेट चीर कर खाते बच्चे
सस्ता बादाम बन जाती,

चिलबिल की तितलियां
बच्चों जैसी ही
साथ खेलती–खाती,
इस पीढ़ी से उस पीढ़ी
याद बनकर रह जाती,
हम बड़े हो गए भले बहुत
नाम किया या किया नहीं कुछ
पर चिलबिल नहीं चिढ़ाती
कहीं दूर से उड़ते–उड़ते
पैरों तक आ जाती,
पेट चीर कर
खुशियां देती
दोस्ती अब तक निभाती।


Echo–Chamber

मै खुद ही बोलता है,
मै खुद ही खुद की
आवाज़ सुनता है,
मै खुद को सुनकर
घबराता है,
मै खुद को सुनकर,
डर जाता है,

मै खुद ही खुद की
किताब लिखकर
खुद को पढ़कर
सुनाता है,
पात्रा को सुनाता है
उन्हें उनकी lines
याद कराता है,
बोलने को कहता है,
और फिर उनका
जवाब देता है,
जवाब को सही और
गलत कहता है,

मै climax ढूंढता है
आज के लिए
कल फिर उसे 
बदलने के लिए
उसी आधार पर
किरदारों को नया
जामा पहनाने के लिए,

Climax मेरे मै का 
Echo–chamber मे
घूमती हुई ये आवाज़,
ये आवाज़ जो 
किसी और मुंह से
निकल कर उनके
वजूद को पिरोती है
और फिर
उलाहने देती है,

मै प्रफुल्लित और होता 
गूंज की आवाज़ मे
अट्टहास करता
और फिर कुछ और
जुटाने मे लग जाता,
खोखली दुनिया की
आकाशवाणी सुनकर
सुदर्शन चक्र जैसा
जीवन गोल–गोल घुमाता,

मै राम–राम, महावीर की 
गाथा जब गाता,
तो मैं को राम का echo
तब समझ आता,
मै खुद echo–chamber
का हिस्सा बनकर
सुखी हो जाता,
मै बुद्ध हो जाता,
मै फिर फिर गाता
"बुद्धम् शरणम् गच्छामि:"

नशा

किसी बात पर फिर से
नशा चढ़ा तो होगा,
तुम्हारे साए की उम्मीद मे
दिल यूंही नही मचला होगा,

कुछ रही होगी मौसम के 
मिज़ाज की गुस्ताखी,
कोई फूल गुलिस्तां मे
वैसा ही खिला होगा,

कुछ इम्तिहान–ए–ज़िंदगी की
नज़र लगी होगी,
कोई हाल–ए–दिल कि किस्सा
नासूर बना होगा,

नशेमन के बिखरने पे
कोई कातर हुआ होगा,
कोई आप–सा लगने से
ये पागल हुआ होगा,
कोई बात तो होगी
नशा ऐसा चढ़ा होगा।

Wednesday, 20 April 2022

चलन

मै चल नहीं पाता
या चलना ही नहीं आता
जाता हूं जिधर भी मै
क्यों ज्यादा नहीं पाता,

आता छूट जाता है,
लिखा ना खूब जाता है,
मै जिसको बात कहता हूं,
वो हांसिए मे ही पाता हूं,

मै फिर से दुहराता,
मै लिख के बैठाता हूं,
मै मंजिल ढूंढता अब तक
या मंजिल को गँवाता हूं,

मंजिल के किनारे मै
आकर मुस्कुराता हूं,
हठ है जिंदगी के ये
या सच से दूर जाता हूं,

सब राहें एक ही तो हैं,
फिर क्यों दौड़ता हूं मै,
समय मेरा नहीं बचता
क्यूं फिर खाका बनाता हूं?

राम का नाम ले चलना या
चलकर राम में मिलना,
राम के फैसले हैं ये
जिन्हे अपना बताता हूं!

सफेद

रोशनी का रंग
अब सफेद है,
हरे और भगवे का
मेल भी सफेद है,
सफेद है रंग अब
पढ़ाई का स्कूल मे,
सफेद है समय भी आज
जुनून मूर्त रूप मे,
सफेद होती राजनीति
अरविंद और नरेंद्र की,
सफेद रंग ओढ़ती रहा है
मासूम की मुस्कान भी,

सफेद ही तो रंग मे थे
बुद्ध–महावीर भी,
सफेद रंग बापू का था
बोस की खादी का भी,
सफेद पटेल–नेहरु का
काम भी था साथ मे,
सफेद रंग साहेब का
हमारे संविधान मे,

सफेद ही बोलते थे
कबीर और रहीम जी,
सफेद रविदास थे
सफेद मीराबाई भी,
सफेद सूरदास थे
सफेद मानस–मंदिर भी,

सफेद टोपी डालकर
कलाम भी तो बढ़ गए,
सफेद रंग केसरी
भगत भी सूली चढ़ गए,
सफेद ही व्यक्तित्व था
माता टेरेसा का बना,
बापू की मुट्ठी से निकलके
सफेद ही नमक बना,

अब मिलाकर हाथ फिर
रंग दो सफेद मे,
देश की तरक्की को
ढाल दो सफेद मे,
सूर्य–चंद्र को मिलाकर
काल हो सफेद मे!

Tuesday, 19 April 2022

Subscriber

WhatsApp करता हूं
Telegram करता हूं,
मै दुनिया भूल जाता हूं
जो तुमसे बात करता हूं,

मै signal तोड़ देता हूं
Duo call करता हूं
तुमको ढूंढ लेने को
मै apps install करता हूं,

Imo पर तुम्हे खोजूं
Messenger पर भी आ जाऊं
मै गूगल पर भी ज्यादातर
तुम्हारा नाम लिखता हूं,

Review पढ़ के magicpin के
खाने रोज जाता हूं,
तुम्हारा नाम ले ले कर
मै zomato पे discount उठाता हूं,

Researchgate पर चर्चे
तुम्हारे नाम के पढ़ कर,
मै linkdin पर तुम्हे request
Profession वार करता हूं,

UPI id से मै जो
कुछ पैसे मांग लेता हूं,
तुम्हारा address लिखकर
Teddy गिफ्ट करता हूं,

Youtube पर तुम्हारा dance
सौ–सौ बार तकता हूं,
तुम्हारी खबर चुराने को
Bell icon दबाता हूं,

E-mail लिखता हूं
Blog मे tag करता हूं,
मेरी subscriber हो तुम
मै कविता आम कहता हूं,

मै FB खोल लेता हूं
Instagram पढ़ता हूं,
की तुमको देख लेने को
मै data on करता हूं,

मै message छोड़ देता हूं
तुम्हे Miss call देता हूं,
बस एक आवाज़ सुनने को
तुम्हे सलाम करता हूं,

परीक्षा और देता हूं
मै फिर से form भरता हूं,
तुम्हारे काम आने को
कहां आराम करता हूं,

मै तुमसे दूर जाने को
बहुत संग्राम करता हूं,
चिढ़ाता हूं तुम्हे लेकिन
मै खुद परेशान रहता हूं,

मै दिन भर राम कहता हूं,
मै उठकर राम कहता हूं
जन्मदिन पर तुम्हारे मै
तुम्हे पैगाम कहता हूं,

मै चंदन–सा नहीं शायद
रवि का छाव भर ही हूं,
कन्हैया–सा नहीं वादक
धनुष भी क्या ही रखता हूं,

नहीं नागों–सा हँसमुख हूं
न महारथ ही मुझे हासिल,
ना कुछ इलाज करता हूं
न वकालत के ही मै काबिल,

जो तुमसे प्यार करता हूं
नहीं विश्राम करता हूं,
सीता मान कर तुमको
हृदय मे राम रखता हूं।😂😂😁

Saturday, 16 April 2022

अभिव्यक्ति

इंसान कविताएं,
क्यों लिखता है?
 क्यों सुनाता है?

कोयल गाती है,
भोर में सुबह को
बुलाती है,
भंवरा मंडराता है,
गुंजन करता है।

फूलों पर कलियों पर 
तितलियां इठलाती हैं,
सोमरस लेती हैं,
उड़कर, बैठकर।

इंसान क्यों लिखता है?
किस सुबह को बुलाता है?
और सुनाता क्यों है?
कौन–सा सोमरास पीता है?😇

ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...