Monday, 21 January 2019

माँ

चाय-पराठे की मिठास मे
नमक की चुटकी जैसी माँ,

याद आती है दरी-कटोरी
बड़की-रोटी जैसी माँ ।।

भूखे पेट ही ऑफ़िस जाते
टूक्की-रोटी जैसी माँ,

आँटे की छोटी लोई से,
राजा मुझे बनाती माँ ।।

हमें नहलाने एक भगोना
तड़के पानी गरम किए,
ठंडे पानी, भीगे बैठी
पत्थर खुज्जे जैसी माँ ।

गरम दुपहरी जाग-जाग कर
और थकावट बढ़ा लिया,
लू और प्यास को सबक़ सिखाती
ठंडी गगरी जैसी माँ ।

कपड़े छोटे,थोड़े खाने
सबको बाँट खपा देती,
अंदर जूने बसन समेटे
सिलती कथरी जैसी माँ ।

दिन की धूल, शाम की सुस्ती,
शरबत देकर मिटा दिया,
रात अन्धेरे, रगड़ गाल पर
कडुआ-तेल के जैसी माँ ।

मेरी कविता मे बसी हुयी,
राम-भजन के जैसी माँ ।

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