Thursday, 17 February 2022

किनारा

दरिया यहाँ तक 
आते–आते सूख जाता है,
वो रहता है नहीं
मौजों का गुलिस्तां
हाथों का बंधा
रेती का बवंडर
छूट जाता है,

सुखी हुई कुछ धारियों–का
पपड़ी–सा रेला है,
शाम–सा लगता हमारा
यह सवेरा है,

जहाँ तक जा रही नजरें
वहाँ पर धुंधला–सा
तुम्हारा और मेरा
रस्ता पुराना
खुरदुरा–सा है,

यहां तक का सफर
ऐ हमसफर
जो बिन तुम्हारे था,
कुछ तन्हा जरा–सा है
बहुत ही अनबना–सा है,

मै कहता हूं
वफ़ा की बात
बहुत ही सादगी से अब,
सुना  तुमने नहीं मुझको
तो किस्सा अटपटा–सा है।

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