केंद्र मे सत्संग,
केंद्र से हटकर
है जरा विध्वंस,
केंद्र के सब ओर
केंद्र के हैं छोर,
केंद्र से अर्जित
उर्मियों के डोर,
जब केंद्र परिभाषित
और आनंदित,
मध्य मार्ग सुगंधित
सत्य और पुलकित!
तुम पर है अधिकार तुम्हारे होने का चलने का, तुम्हारे बातें मुझसे करने का और फिर तुमसे मिलने का, यह बोलो और फिर शांत रहो मैं सोचूँ और तुम ...