तुम्हारे होने का चलने का,
तुम्हारे बातें मुझसे करने का
और फिर तुमसे मिलने का,
यह बोलो और फिर शांत रहो
मैं सोचूँ और तुम कर ही दो,
मेरे रोने से पहले मेरे
आँसू से मोती हाथ में लो,
मैं ले लूँ तुमको आगोश धरूँ
मैं रात रागिनी बन महकूँ,
मैं अधरों के अंतर मे शामिल
कर तुमको कुछ ना बोलूँ,
मैं ओढ़ तुम्हे सीपी जैसा
अपने को मोती कर लूँ,
मैं रात जगूँ, दिन भर सो लूँ
मै आग कहूँ और जल-नेत्र भरूँ
मैं सुबक-सुबक कर हाथ धरूँ
तुमपर सारे इल्ज़ाम रखूँ,
अपशब्दों की माला चुनकर
रोज सुबह खाने में दूँ,
ना कलम रखूँ, ना बटन कसूँ
ऑफिस को होठों से धर लूँ,
बिंदी मे देखो मेरे तुम
सूर्य-ग्रहण सा अंधकार,
चांद रात की चादर से
मैं अपने तकिये मे कढ़ दूँ,
मैं जो चाहूँ तुमसे पा लूँ
नभ-सा मेरा विस्तार प्रिये,
अपनी बगिया से उड़ आई
हमसफ़र मेरे, हमनफज मेरे,
तुम गगन, पवन से अंतहीन
मेरी पंखों का अधिकार प्रिये!
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