Sunday, 29 March 2026

धृतराष्ट्र

अंधा है बैठा 
एक धृतराष्ट्र,
आज फिर
समाज में, 
लोकतंत्र के 
विशाल काज में,
मुँह में गुटका है 
और है आखों में 
एक तिरस्कार, 
गर्दन उठा कर 
देखता वो 
पांडवों की सर्कार, 
कुछ बोलता नहीं 
पर घोलता ज़हर, 
मंच से इधर जुटा कर 
संजयों की कतार,
ना वोट डालता
ना आवाज ही करता
फुंकार करता जोर से
दहाड़ता घर भर,
घुसमुसाया-फुसफुसाया
कसता सभी पर तंज,
आज का धृतराष्ट्र 
खुद से खेलता शतरंज!

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