Thursday, 22 May 2025

कली

धूप से लड़ी
हवाओं से खिली,
किसी सहारे के बिना
बेलों-सी चढ़ी,
मेरी उपवन की 
आखिरी कली!

सड़क के मोड़ पर
आकर मिली,
किसी भाव मे विकिर्ण 
किसी ताप से जली,
कई राह छोड़कर 
पगडण्डी पर चली, 
मेरे जेठ की धूप मे
छांव-सी अली!


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