Monday, 21 January 2019

राधा

मुरली सुनकर, छत पर छुपकर
धीरे से चढ़ जाती वो,

मम्मी की पुकार सुनकर,
धीमी आवाज लगाती वो,

मन मसोसकर, phone काटकर
मन ही मन पछताती वो,

बात में गुम हो, दूध खौलता
छोड़ के आती वो,

मम्मी की डाँट का हुबहू,
नक़ल बनाती वो,

राम नाम का ध्यान धरे,
सीता-सी अघाती वो,

स्कूल से आकर अंतर मन से,
मुझे बुलाती वो,

बातें करती, सपने बुनती,
ख़ुश हो जाती वो,

तिनकों के घरौंदो से चुन-चुन कर,
मुझे भुलाती वो,

उधौ की बात को सच मानकर,
कृष्ण मिटाती वो।

Friday, 11 January 2019

सोन चिरईया

चीं चीं करती सोन चिरईया,
मेरी प्यारी सोन चिरईया,
हर दम गाती सोन चिरईया ।

बड़ा बहेलिया जंगल आया,
उसने अपना जाल बिछाया,
थोड़ा सा तुमको धमकाया,
आँख दिखाया, रौब जताया ।

तुम्हारे गाने को fake बताया,
और मंशा पर प्रश्न उठाया,
कई जतन कर तुम्हे घुमाया,
कातर करके तुम्हे भगाया,

फिर भी उसका दाना खाकर,
तुम फुर्र-फुर्र उड़ जाती हो,

सोन चिरईया,सोन चिरईया
तुम हँस कर बात उड़ाती हो।

चीं चीं ऽ ऽ ऽ करके गाती हो।

बड़ा-सा जब stage सजाया,
गाने को तुमको बुलवाया,
और भीड़ की जंगल को,
न्यौता देकर भी कहलाया।

पर तुम तो दिन भर सोयी थी,
देर रात तक अलसायी थी,
Performance के लिए तुम्हारी,
तैयारी ना हो पायी थी,

सुबह हुआ जब मंज़र आया,
नहीं तुम्हारा मन घबराया,
इक बंदर का मस्त-कलंदर,
तुमने सबको नाच दिखाया,

पीछे की कुर्सी पर बैठी,
कैसा रास रचाती हो ।

सोन चिरईया,सोन चिरईया,
तुम सबके मन को भाती हो।

सोन चिरईया,सोन चिरईया,
मैंने नहीं समझा था अबतक,

तुम झुर्मठ से इठलाती हो,
छुपकर तुम गाना गाती हो,
सबका मन तुम बहलाती हो,
मुझसे ही बस शर्माती हो।

क्यूँ तुमने मुझको भरमाया,
अपना गाना नहीं सुनाया,
क्यूँ अपनी किस्सों का तुमने,
मुझको हिस्सा नहीं बनाया ?

यही सोचकर ग़ुस्सा था मै,
पर ग़ुस्सा भी टिक ना पाया,
अपने अंत:चक्षु खोलकर,
मैंने तुमको अपना पाया।

सबको धर्म का बोध कराके,
तुम 'शृजाम्यहम्' दर्शाती हो,

सोन चिरईया,सोन चिरईया,
मेरी कविता में घुल जाती हो।।
सोन चिरईया,सोन चिरईया,
सबसे प्यारा तुम गाती हो।।

Thursday, 29 November 2018

कुम्भकर्ण

"मुझे लगा की
कुम्भकर्ण बड़ा है,
क्यूँकि वह
दिखता बड़ा है।

मैंने confirm भी
किरन से किया है,
क्यूँकि उसको तो
सबकुछ पता है।

मैंने कुम्भकर्ण से
प्यार किया है,
यह बात "शायद"
उसको पता है ।"

क्या कुम्भकर्ण को
तुमने बताया है ?
"नहीं ऽऽऽऽऽऽ !
उसको तो बस
सोना होता है ।"

तुम्हें ऐसा क्यूँ लगा है ?

"मैंने पूछ लिया है !"

किससे ? कुम्भकर्ण से ?

"नहीं ऽऽऽऽऽऽ !  किरन से !
क्यूँकि उसी को तो
दुनिया मे सबकुछ पता है।"

Thursday, 1 November 2018

तुम क्या सोचती हो ?

तुम्हारे ज़हन मे
बहुत खलबली है,
तुम्हारे नज़र मे
बड़ी जुस्तजूँ है,

क्यूँ अपनी घुटन को
हवा दे रही हो,
क्यूँ भेद अपने
जताती नहीं हो ?

तुम क्या सोचती हो, बताती नहीं हो !

तुम्हारे कंधों पे
बाज़ू चढ़ाया,
तुमको ही मैंने
गले भी लगाया,

तुम्हारी scooty पे
मै पीछे बैठा,
मंदिर के चौखट से
तुमको ही देखा,

तुम क्यूँ अब मंदिर मे
आती नहीं हो,
मेरे आग़ोश में भी
समाती नही हो,

पर कंधों से अपनी
मेरी ये बाँहें,
क्यूँ कर कभी तुम
हटाती नहीं हो ?

तुम क्या सोचती हो, बताती नहीं हो !

बहुत कुछ है जो तुम
बताती नही हो,
पर लगता है यूँ
कुछ छुपाती नहीं हो,

करती थी बचपन से
Music की classes,
रामायण के चर्चे,
Cartoon की बातें,

सो जाती थी पेड़ों की
झुर्मुठ में खोकर,
लड़ती थी भाई से
खुलकर-झपटकर,

सुनाती हो क़िस्से
मन मे खिल-खिलाकर,
पर क्यूँ लबों से
मुस्कुराती नहीं हो ?

तुम क्या सोचती हो, बताती नहीं हो !

Tuesday, 25 September 2018

Rolle's Theorem

गर तुम मुझसे,

करती थी प्यार तब भी,
करती हो प्यार अब भी,
तो है इस दरमियाँ ही,
तुम्हारी बेख़ुदी की हद भी,

क्यूँकि तुम विचारों से
निरंतर बही हो।।

इस बेख़ुदी की हद से,

बदली है तुमने रूख भी,
ले ली है तुमने सुध भी,
तो हाँ उस घड़ी ही,
तुम थी गयी ठहर भी,

क्यूँकि तुम स्वभाव से
विचलित नहीं हो।।

इस प्यार की वजह से,

तुझमें बसा खुदा भी,
मुझमें बसा खुदा भी,
और हो गया ये प्यार,
ज़र्रे से बढ़के रब भी,

क्यूँकि तुम प्रभाव से,
अब संकुचित नहीं हो।।


Sunday, 16 September 2018

PhD in Humanities

जब तलक तुम bachelor हो
Course कोई भी करो,
पर Major करने से पहले
एक बारी सोच लो !

क्यूँकि
bachelors मे कुछ भी करो,
Nobody cares,
But once you want to Major,
Your "social" background matters.

ये Major का विषय
तुम्हारे PhD को topic देगा,
पहचान तुम्हारी और तुम्हारे
ज्ञान का द्योतक होगा।

यही कहेगा कि तुम कितना
ध्यान दोगे काम पर,
Doctor यही बनाएगा
और जुड़ेगा नाम पर।

Major करने के बाद
कुछ वक़्त research ज़रूरी है,
और JRF भी ले लेना
गर पैसों की मजबूरी है।

क्योंकि नहीं पता तुमको
कब 'प्रकाश' चला जाए,
और तुम्हारी funding को
'ईरानी' केतु खा जाए।

फिर किसी भी college के
Admission ka पर्चा भरना,
और भाजपा नहीं पसंद तो
JNU नम्बर १ रखना।

Clear करके exam
Viva-voice मे बात करना,
राम नाम लेकर कॉलेज मे
फिर तुम प्रस्थान करना।

पाँच साल का अनुभव तुम्हारा
ज्ञान से भरा होगा,
और यक़ीनन आगे बढ़कर
भाग्य भी स्वरा होगा।




Friday, 6 July 2018

भारत की बेटी


भारत की बेटी बड़ी हो रही है,
भारत की बेटी बड़ी हो गयी है....

वो घूम रही है गली और गली,
बनारस से बम्बई, बम्बई से दिल्ली,
भुवनेश्वर से Columbia,
Columbia से andaman और Nicobar,
वह देख रही है Picture, ट्रेन में बैठकर,
एक के बाद एक, दो और दो चार,
मुस्कुरा भी रही है,
boyfriends की line लगाकर,
रुपये के बूतों के,रिश्ते ठुकराकर...

हया को वो ठेंगा दिखा जो रही है,
वो बेटी बड़ी बेहया हो गयी है।

वो पढ़ रही है कॉलेज में जाकर,
पहुँच जाती है ख़ुद ही scooty चलाकर,
भरे है उसने JRf के पर्चे,
उठाने लगी है ख़ुद के वो ख़र्चे,
Tuition पढ़ाती है, coaching चलाती है,
आजकल वो पैसे,
सिर्फ़ कमाने के लिए भी कमाती है,
घूमने जाती है और घूमाती है,
पैसे उड़ा के वो भी ख़ुश हो जाती है,
वो phd करने से ख़ुश हो रही है,
अपनी गाइड भी वो ख़ुद चुन रही है,

पढ़ने, कमाने वो जा जो रही है,
वो बेटी बड़ी बेपरवाह हो गयी है।

वो करने लगी है राजनीति के चर्चे,
समंदर में गाड़े हैं उसने भी झंडे,
Cricket खेलती है फ़िरंगी से जाकर,
हारकर भी पाती है, दिलों के वो medal,
Olympics में लायी कई सारे पदक,
वो योग और स्वच्छता की बनी है ambassador,
TheHindu में लिखने लगी है article,
और tv पे aati है prime time लेकर,
रक्षा और विदेश की नीति बनाकर,
वो करती है बातें सबको चुप कराकर,

वो आयी जो माथे पे चंदन लगाकर,
वो बेटी ना जाने क्या-क्या कर गयी है।

वो करती है जूडो, करती कराटे,
करती है पेंटिंग, करती theatre,
वो गाने भी गाती है, वो है youtuber,
वो सुनती है बातें, है वो motivator,
जिस्म ही नहीं बेचती वो सिनेमा पर,
लिखे जाने लगे हैं, उसपर भी character,
Barbie मे भी आए हैं उसके रोल multiple,
वो घर भी बनाती है, भाई से बढ़कर,
वो हँसाने लगी है, बतियाने लगी है,
समझदार हो गई है, फ़ोन उठाती निडर,

जो ख़ुद को है समझा, उसने कई दिनों पर,
वो लक्ष्मी स्वयं शारदा हो गयी है।

पर हैं कुछ अभी भी, परदों में छुपकर,
बस जी लेती हैं जो किसिकी पत्नी ही सजकर,
पिता के कहे पर कोई form भरकर,
ज़माने की नज़रों से इज़्ज़त बचाकर,
पढ़ती अंधेरों मे, कुछ रोशनी चुराकर,
लड़ती हुई एक दूसरे से जलकर,
कुछ पित्रिसत्ता के टुकड़ों पर झपटकर,
अपने सपनों पर उसका मरहम लगाकर,

क्या उनको देगी सहारा ये बेटी, हाथ बढ़ाकर ?
ख़ुशियों को दिखाकर, दुखों को भुलाकर ?

क्या इतना वो बेटी खड़ी हो गयी है ?
क्या भारत की बेटी सचमुच बड़ी हो गयी है ?








Wednesday, 23 May 2018

Rape

"आशाराम को सज़ा हो गयी !"
वो चहक गयी यह कहकर,
"चलो किसी दरिंदे को सज़ा मिली !"
बोली वो अख़बार पढ़कर।

भारत आज आगे बढ़ा है,
यह समझकर,

वह बोली,
"उसने सोचा होगा क्या
कैसे अकेले पाकर,
दबोचा होगा कहीं
अकेले में ले जाकर,
आँखें तरेरी होगी
चेहरे को लाल-कर,
जकड़ लिया होगा
उसको डराकर,
चुप करा दिया होगा
उसको चिल्लाकर।

और वो अबला,
सिहर गयी होगी
सच जानकर,
छटपटायी होगी कुछ
ताक़त लगाकर,
माँ को ढूँढती हुयी
झाँकी होगी बाहर,
पुकारा होगा 'मम्मी ऽ ऽऽऽऽऽऽ'
शायद घबराकर

किंतु रुका होगा वो
अपनी ताक़त आज़माकर,
शांत हुआ होगा
अपने अहम् को बढ़ाकर।"

"महफ़ूज़ रखा मुझको
घर में छुपाकर,
बचपन में ही योनि से
परिचय कराकर,
हर हरकत पे
मुझको ही 'रंडी' बताकर,
झपटकर, डपटकर,
धमकाकर,डराकर,
मेरे पिता ने मुझे
दुनिया से बचाकर।

मै नहाती भी नहीं हूँ
पूरे कपड़े उतारकर,
जो सर दर्द होता
कभी भी भयंकर,
खा लेती हूँ एक साथ
Painkiller दो चार,
पढ़ने भी जाती
नहीं हूँ मै बाहर,
नहीं हूँ 'उन'
लड़कियों जैसी फक्कड़,
इसलिए नहीं होगा मेरा
Rape भी कभी कर।"

बता ही रही थी यह
मुझे वो phone पर,
की आवाज़ आयी
"सावित्री ! बेटी आओ इधर"
Phone काटा उसने
डरकर, सम्भलकर !

एक हल्की-सी आवाज़
आयी थी रिसकर,
"हम्म ! मेरी बेटी वैसी नहीं है ! "
कहा ब्राह्मण ने
शायद, अख़बार पढ़कर।

Tuesday, 1 May 2018

गज़ल़

दिल के हैं अच्छे लेकिन, बुरा भी तो करते हैं।

Auto मे या metro मे,फ़ोन मिलाकर वो,
बातें भी तो करते हैं,हँसने भी तो लगते हैं।

फ़ुर्सत मे वो बैठे हों और फ़ोन मै कर दूँ तो,
थकने भी तो लगते हैं,सोने भी तो लगते हैं।

नाराज़ हों हमसे वो,तारीफ़ मै कर दूँ तो,
झपटने भी तो लगते हैं,लड़ने भी तो लगते हैं।

मन से उनको निकालूँ अगर,कविताओं में मेरी,
आने भी तो लगते हैं, बसने भी तो लगते हैं।

परेशान वो बैठें हों, और याद मै कर लूँ तो,
रोने भी तो लगते हैं,सम्भलने भी तो लगते हैं।

होली पर उनको मै, रंग लगा दूँ तो,
घुलने भी तो लगते हैं,मिलने भी तो लगते हैं।

ग़ुस्से में अगर आकर,ना फ़ोन उठाऊँ तो,
Telegram पे भी आते हैं, whatsapp भी तो करते हैं।

छुपकर मिलने पर,अॉंखों से मेरी रिसकर,
बाहों मे पिघलकर,सासों मे बसने भी तो लगते हैं।

कस्मे-वादों पर जब बात हो हिम्मत की,
डरने भी तो लगते हैं,हटने भी तो लगते हैं।

ज़ुबान से अकसर, सुनते ही नहीं जो,ब्लाग पे आकर वो,
पढ़ने भी तो लगते हैं,समझने भी तो लगते हैं।

दिल के हैं अच्छे लेकिन, बुरा भी तो करते हैं।

Friday, 6 April 2018

मीठी-मिशरी

काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।

न होती तुम्हारी
आवाज़ मीठी,
न होता तुम्हारा
अंदाज़ बचपन,

होती तुम्हारी भी
बातों मे अईठन,
बिगड़ जाती तुम भी
हर बात, हर क्षण,

मन मे तुम्हारे भी
वीषाद होता,
थोड़ा-सा तुममे भी
अभिमान होता,

तुम मेरे ज़ेहन मे यूँ उतरी ना होती।
काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।।

नाक पर तुम्हारे
दो तिल ना होते,
होंठों की पतली
सुराही ना होती,

मै बाहों मे लेकर
तुम्हे चुम लेता,
और दुनिया मे कोई
तबाही ना होती,

मेरे मुहब्बत को तस्लीम मिलती, बाज़ार मे उसकी तफ़री ना होती।
काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।।

आँखों मे झूठा-सा
ग़ुस्सा ना होता,
मै तुम्हारी ढ़लती शामों का
हिस्सा ना होता,

तुम स्कूल से आकर
मेरी गोद मे ना सोती,
मै सहलाता ना सर
कोई किस्सा ना होता,

तो फिर तुमसे दूरी यूँ अखरी ना होती।
काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।।

ना करते परीक्षा
पढ़ाई की बातें,
कवितायें मेरी
ना किसीकी सुनाते,

न गाँधी,अहिंसा,
न 'गीता' की बातें,
न महिला,न बेब़स,
न बँटती सरहदें,

मेरी समझ इतनी गहरी ना होती।
काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।।

ना दिवाली के दिये
मेरे संग सजाती,
न होली अकेले
मेरे संग मनाती,

ना रामचरित,
ना 'दिनकर', ना 'बच्चन',
ना मै पढ़ सुनाता
ना तुम गुनगुनाती,

तो मेरी ज़ुबाँ भी यूँ फिसली ना होती।
काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।।

रातों मे मेसेज से
बातें ना होती,
जो सच मै न कहता
तुम झुठ ना दुहराती,

ना बीमारियों पे
कोई मलहम लगाते,
ना शामें सुबकतीं
ना रातों मनाते,

तो 'पम्मी' भी कोई लड़की ना होती।
काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।।

ना खाना बनाती
मेरे संग दुपहर,
ना ही परागु
ना ही कोई मधुकर,

इन ज़ायक़ों से वाक़िफ़ यूँ ऊँगली ना होती।
काश ! की तुम मीठी-मिशरी ना होती।।

Thursday, 8 March 2018

निष्ठुर

ढलती हुयी निशा को,
प्रकाश निष्ठुर है,
उफ़नती हुई घटा को,
बरसात निष्ठुर है,
फैली हुई दिशा को,
आकाश निष्ठुर है,
उभरी हुयी ऊषा को,
अंगार निष्ठुर है ।

मन की तरंग को तो,
अल्फ़ाश निष्ठुर है,
निर्गुण हुए ख़ुदा को,
साकार निष्ठुर है,
चढ़ते हुए नशे को,
आभास निष्ठुर है,
मेरे अन्त:करण को,
भ्रमजाल निष्ठुर है।

उसराती हुयी धरा को,
क्या बाढ़ निष्ठुर है ?
'बापू' के देश मे,
क्या 'मोदी-सरकार' निष्ठुर है ?
लिखते हुए प्रेमचंद को,
क्या आराम निष्ठुर है ?
खेलते हुए ध्यानचंद को,
कोई 'ज्ञान' निष्ठुर है ?

क्यूँ कर मेरी दुआ को,
इंकार निष्ठुर है ?
क्या तुम ही निष्ठुर हो ?
या की प्यार निष्ठुर है ?

ज़रूरी है,

कालचक्र की फिर से,
शुरुआत हो जाए,
किसी को अपनी सीमा का,
ज़रा एहसास हो जाए,
सृजन का फिर कहीं,
नव-रूप में आग़ाज़ हो जाए।

अतः ना तुम ही निष्ठुर हो,
ना ही प्यार निष्ठुर है ।।

ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...