Saturday, 9 April 2022

मेघालय से दिल्ली

मेघालय मे ठंडी थी
दिल्ली जाकर गर्म हो गई,
मेघालय ice–cream थी
दिल्ली जाकर पिघल गई,
मेघालय मे बादल थे
दिल्ली जाकर धुआं हो गए,
मेघालय मे झरने थे
दिल्ली जाकर यमुना हो गए,
मेघालय मे बस चलती थी
दिल्ली मे platform बन गई,
मेघालय की धीमी गाड़ी
दिल्ली जाकर express हो गई,
मेघालय मे बच्चे थे
दिल्ली जाकर क्रांति हो गई,
मेघालय मे fruit जूस
दिल्ली जाकर cocktail बन गई,
मेघालय की खुर्की अब
दिल्ली जाकर राफेल बन गई,
शिलांग की टूटी ओड़िया–हिंदी
JNU मे अंग्रेज़ बन गई,
अंग्रेजी पढ़ती दोस्त सरल थी
Spanish पढ़ दिलफेंक हो गई!

सौम्या

तुम चली गई तो
चला गया तुम्हारे
जैसा होना भी,
ना प्रीत के संग ही
प्रीत मिली,
ना रोने के संग
रोना ही,

कौन सरल
और सौम्य रह गया
जो हंसता होगा,
बिन मतलब
कौन गरल
घूंट पिएगा,
किसी और का
लगा तलब,

कौन है जो फिर
इधर उधर की
बातों में भी रस लेगा,
कौन मेरी भोली बातों
मेरे ही मुख सूनेगा,
कौन करेगा इंतजार
मेरे फोन का घंटों तक,
कौन लपक कर
बाहर जाकर
मुझे बताएगा छुपकर,

कौन मेरी, जग की
कटुता को
समझ के परे ही पाएगा,
कौन शब्द से आहत होकर
नाहक नीर बहायेगा,
कौन मेरी बात राम तक
बिना लपेट पहुंचा देगा,
कौन चांद को धर ललाट पर
धीरे से सो जायेगा,

कौन कहेगा जन्म–जन्म के
खेल हैं सारे बंधन के
कौन गोपाल की प्रतिमा का सा
मुरली बांधे क्रंदन मे,
विप्लव को कौन पकड़ लेगा
बच्चों–सा पैर पटक लेगा,

तुम चली गई तो नहीं हवाएं
पूरब से मद्धम बहती हैं,
नीम के पेड़ के छांव तले
अब नहीं नरम दुख बहती है,
अब कौन तुम्हारे जैसा है
जो पढ़ने को कहा करेगा

कौन है तुमसा 
अब जहां में
जो हृदय मे फिर से आ बसेगा?

Friday, 8 April 2022

बढ़ी बात

मौसी छोटी–सी बात को
बढ़ा देती हैं,
मौसी बातों में ही
उलझा देती हैं,
मौसी प्रश्न ऐसे
पूछ देती हैं,
जो मां भी सबसे
छुपा देती हैं,

मौसी छोटी–सी बात को 
बढ़ाकर बताकर
बात बढ़ने से पहले
बचा लेती हैं।

Wednesday, 6 April 2022

राम लड़ाई

सब राम से ही मांगते हैं
राम नहीं दे रहे हैं,
राम से प्राण पाकर
सब राम से ही लड़ रहे हैं,

राम पर ही दोष है,
राम पर चित्कार है,
राम के विरोध मे
राम तिरस्कार है,

राम के बिना जिया जो
राम से मजबूर है,
राम को सिखा रहा
आज का दस्तूर है,
राम को खलल पड़ी है
राम के ही रूप से,
सब राम को करते रहे हैं
राम–राम दूर से!

सताना

अब सताने के लिए
तुम कुछ नही करती हो,
अब फोन नहीं करती
अब बात नहीं करती,
अब नाम मेरा लेकर
आवाज़ नहीं करती,

अब हाल नहीं पूछती हो
अब हंसाती नही हो,
अब बिना मतलब के तुम
पास आती नही हो,
अब नही जलती
किसी और से
बस मुझसे,
अब नही मेरे लिए
लड़ जाती हो खुद से,

अब नही सताती तो
तड़प ज्यादा होती है!

सुबह

सुबह उठा तो सब
जाग चुके थे,
सूरज चढ़ चुका था,
चिड़ियां गा चुकी थी,
चूहे और छछुंदर
बिलोर–बिलोर के
जा चुके थे,

रोशनी फैल चुकी थी,
मन उचट चुका था,
भजन हो चुका था
रात जा चुकी थी,
ठंड लग नहीं रही थी
कंबल उधड़ चुका था,

मच्छर कमरे के अंदर
और मच्छरदानी के ऊपर
से उड़ चुके थे,
अंदर के मच्छर,
इतना खून पी
चुके थे की,
मस्त और भारी
हो चुके थे,
मच्छरदानी के
निचले ओर पर
मच्छरदानी खुलने
की फिराक मे
बैठे हुए ऊब रहे थे,
चद्दर एक तरफ
उघर चुकी थी,
कूलर का पानी
खतम हो गया था,
पंखा गरम हवा
फेंक रहा था,

ब्रह्म मुहूर्त 
जा चुका था,
विद्यार्थी अब
मै कैसे बनूं अच्छा
मेरा वक्त गुजर चुका था!

Monday, 4 April 2022

तुस्सी जा रहे हो!

तुम हमे रुलाकर
हंसाने के बाद
फिर से जा रही हो,

हमारे साथ कुछ जीकर
हमे जिंदा कर
जीना सिखाने के बाद
फिर से जा रही हो,

जैसे रात जाती
ओस की बूंदे गिराकर,
जैसे धूप जाती है
चिलचिलाने के बाद,
जैसे लहर जाती
पांव धोने के बाद,
जैसे रूह जाती है
सो जाने के बाद,
तुम फिर से जा रही हो!

सारनाथ भी बस 
बगल में नही था,
गंगा नदी भी 
दूर बह रही थी,
भोलेनाथ को भी 
जानते नही थे,
हम सुबह–ए –बनारस को
मानते नही थे,
हमे उनसे मिलाने के बाद
तुम फिर से जा रही हो!

बरसात आकर के
हमारे घर भिगोती थी,
धूप तंग करती हमे
छूकर जलाती थी,
बारात जाती थी
सड़क से शोर–गुल करके,
नवरात्र रातों मे हमे
नाहक जगाते थे,
इन्हे त्यौहार बनाने के बाद
तुम फिर से जा रही हो!

हमारी परीक्षा थी
और जागती थी तुम,
अंधेरों मे निराशा मे
उंगली थामती थी तुम,
होली मे रंगों मे
महज बचते रहे थे हम,
हमारे हाथ रंगों से सजाकर
चिढ़ाती रही थी तुम,
हमारे रंग मिलाने के बाद
फिर से जा रही हो तुम!

फिल्में थी या
बहस कर रहे थे,
हम जो भी कुछ
बेवजह कर रहे थे,
वही जीने का मकसद है
बताकर आज हम सबको,
गीता आज अर्जुन को
जिलाकर जा रही हो तुम!

चोरी

थोड़ा वक्त चुराकर
देख लिया कुछ,
कुछ तुमसे भी
खुशियों की 
चोरी कर ली,

कुछ पल पढ़ाई से
छुप कर निकाला
एक कविता लिखी
वाह वाही कर ली,

कुछ क्षण उठाए
बगावत को मैने
अपने सुकून से 
लड़ाई कर ली,

मैने देखा syllabus
थोड़ी देर तक
कुछ topics मैने
ताड़ों पे धर दी,

चोरी से सोया मै
चोरी से जागा,
और अपने मे
हेरा–फेरी–सी कर ली,

देखा वो मैने
जो नहीं देखनी थी,
सोचा वो मैने
जो नहीं सोचनी थी,

पर अपनी वजह को
वजह कुछ बताकर
मैने राम नाम की
कुछ चोरी कर ली।

Sunday, 3 April 2022

Spectrum

ये तुम्हारी मेरी बातें
खतम नहीं होती,

हर पढ़ाई के बाद 
तकरार है कोई,
कोई प्रश्न छूटता है
इनकार है कोई,

किसी वजह में 
कोई वजह है,
जो बेवजह लगती है,
कोई भाव है
खालिश भरी
जो बेवजन लगती है,

कोई हाल पुराना है
जो स्वर्ग था बना
कोई आज कलेश है
जो नर्क लग रहा,

हर बार कोई 
एक बिंदु 
छूट जाता है,
रह–रह के वही
घूम–घूम 
फिर से आता है,,

कोई है नहीं किनारा
ना ओर –छोर है,
बातों का हमारी
मज़्म और है,

तर्क है, कुतर्क है,
चढ़ी हुई हैं त्यौरियां,
आज नृत्य कर रही हैं
बढ़–चढ़ के बोलियां,

इतिहास के प्रसंग
भूगर्भ की है पंक्तिया,
समाज की भी झांकी है
फ़िल्मों की बैसाखियां,

देश है, विदेश है
विज्ञान की है दुर्दशा
तुम्हारी बात में कभी तो
सात रंग दिख रहा,

तुम उमंग की तरह 
सूर्य से बिखर गई,
रोशनी नई बनी
झंकृत सभी मे हो गई,

कोयलों की गूंज है
भंवर की गुनगुनाहटें,
बात की सरिता है करती
पर्वतों मे आहटें,

इधर–उधर
पलक–झपक,
चटर–पटर
खटर–खटर,
उठा–पटक
धबड़–धबड़,
दबी हैं मेरी बोलियां,

कथक–सदृश
लस्य–रस,
घूमती घूमर–घूमर
आग –जल
पृथक–पृथक,
गर्जती–सी 
कलारिपयट्ट,

मराठी–आंग्ल की भिड़ंत
हिंदी वाक प्रखर–सरल
रंग–रूप का मिलन
निर्बाध हो रहा यौवन,
अधर के मिलन–चुभन
दूर–पास, सरल–सघन,

आज जुगलबंदी करती,
फैली हुई Spectrum !🙏🙏

Friday, 1 April 2022

स्कूल जाकर क्या करोगी?


तुम स्कूल जाकर क्या करोगी?
मुंह ढका हुआ
तन ढका हुआ,
पेट तुम्हारा
फुला हुआ है,

आंखे तुम्हारी 
देख रही हैं,
कान तो सुनने
के काबिल हैं,
ज़ुबां तुम्हारी
खा लेती हैं,
तुम मुंह से बोल के क्या कर लोगी?

खाना बनाना 
आता ही है,
खुश भी मुझको 
कर लेती हो,
घर के चार दिवाल
के पीछे
हंसना गाना
कर लेती हो,
हाथ–गोड़ से 
चल ही लेती हो !
कलम चला कर क्या कर लोगी?

चौराहे तक
जा सकती हो,
मोल–भाव भी
कर सकती हो,
हुश्न–जमाल की
रंगत पर तुम,
लाली खुद से
लगा सकती हो,
कह दो जो है
मर्द से कहना,
तुम संसद जाकर क्या कह दोगी?

कौन तुम्हे महफूज़ रखेगा
चोरों–डाकु–गुंडों से,
कौन चरित्र का परचम देगा
अग्नि–दाह से निस्बत से,
चारो तरफ हमीं फैले है
हमे ज्ञान अपनो का,
हममे बसी है क्रूर आत्मा
जो बस रची है हिंसा से,
हमको हंसा–रुलाकर
तुम अपने जैसा ही कर दोगी,

खान अब्दुल गफ्फार खान के जैसा 
हमे बना कर क्या कर लोगी?
बामियान के बुद्ध के बूत लगाकर
तुम तालिबान को क्या कर दोगी?

डर

मुझसे जो डर के करे बात
वो पहले से ही डरी हुई थी,
जो मुझसे मुंहज़ोर लड़ी
वो बहुतों के मुंह लगी हुई थी,

डर मेरा था या था उसका,
बल मेरा था या था उसका
गलती मेरी नहीं है कोई
यही मै सोचा करता था,

पर प्रेम की भाषा में भी 
क्यूं मै डर के सोचा करता था?
दिल की गली में जाकर क्यों
मै मन से सोचा करता था?🤭

ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...