जमीं पर,
उसकी भूख हद की
मरोड़ पर,
ऊंची आवाज
और खिजलाहट
यह समाज की
बेरुखी की
झुंझलाहट,
सोमरस मे बिसरे
कायदे के बोल,
ये डर दुकानदार का
ये ग्राहकों के धौंस,
एक दूसरे के सन्मुख
कृष्ण के दो ठौर!
झूला झूले रज का कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच करते नृत्य जुगलबंदी...