मै परस्पर इधर और उधर
दोनो मे है जंग
एक नई हुड़दग
आगे और पीछे
छूकर सींग के कुछ अंग
पाना चाहे जीवन रंग
और वो व्याकुल
बदलता हर घड़ी के संग,
जो कर चुका है
भीड़ मे बैठा,
मजे लेता
बहुत हंसता,
जैसे है लड़कपन
की ये बात–जल्लीकट्टू !
झूला झूले रज का कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच करते नृत्य जुगलबंदी...