Wednesday, 14 June 2023

बादल

हम बादलो के 
साथ रहकर 
बरसात जानते हैं,
हमें महलों मे
दावत मत दो,
हम सिद्धार्थ का 
उन्माद जानते हैं,
अभी दोपहर तक 
उड़ लेंगे 
पानी पीने से पहले,
हम हवा मे
ऊँचाई का 
अंदाज जानते हैं,

आज जाने दो हमे
गया और सारनाथ 
हम राजाओं की भी 
औकात जानते हैं,
राम का रास्ता 
ढूंढते हैं
जंगल मे पीछे-पीछे 
सत्ता मे रहने वाले
हमें अनजान जानते हैं,
भरत मिलाप का 
सजाते हैं वो समाधि,
पर राम के आने का 
अंजाम जानते हैं,

आज रात हमें 
नींद आ ही नहीं रही,
जानने वाले तुम्हें 
बदनाम जानते हैं,
अँधेरे मे सितारों से 
रोशनी मांगते हैं,
जो पूनम को भी 
अंधकार जानते हैं,

पोथी पढ़ने वाले 
हर्फों को पी रहे हैं,
वो त्याग को भी 
वनवास जानते हैं,
राम को कमियाँ 
गिनाने मे लगे हैं,
पूछने पर कहते हैं
'श्री राम जानते हैं'!

दुविधा-पथ

तुम कहाँ हो 
इन बातों मे,
इरादों मे
जद्दोजहद मे,
उधेड़-बुन मे,

तुमको कहाँ रखूं 
इस अधूरेपन मे,
मोहब्बत के 
अरमान मे,
या सवालों के 
जवाब मे?

नासमझी का 
दौर था वो,
कुछ जाना नहीं 
तुम्हारे सिवा,
किस-किस पहलू 
को सवारूं 
तुम्हारे इन्तेज़ार मे?

आज याद है 
तुम्हारी 
मुझको चिढ़ाती,
राम से मिलवा के 
राम को प्रश्न उठाती,
कौन से गम उठाऊ
कुछ इत्मीनान मे?

अब भेद जाती है 
कुछ बातें पुरानी,
आज समझ भी 
कर रही 
खुलकर नादानी,
अब गांडीव 
को सजा लूँ 
कौन-से बान मे?

अब फ़कीरी की 
फितरत है
राम के दरबार मे,
मन खोजना चाहे
खुद को कैलाश 
के धाम मे,
देश की वेदी पर 
तुमको कौन-सी 
पुकार दूँ?

Tuesday, 13 June 2023

ठहर कर

विचारों को देखो 
ठहर कर ज़रा-सा,
ना बोलो ज़रा भी 
टटोलो जरा-सा,

किसी को उठाकर 
पटकने लगेगा,
किसी से बहुत दूर 
चलने लगेगा,
किसी से हो गुस्सा 
ना बातें करेगा,
नए कर्म कर के 
नए ग़म मोल लेगा,

जो आते विचारों से 
भावों को ना बदले,
तो भावों के आने से 
विचार भी ना बदले,
हम दूर ही बैठे 
अगर उनपर हंस ले,
विचारों के होंगे अंत अपने!

Friday, 9 June 2023

राम-पथ

राम वहां से 
निकले हैं,
राम यहां 
कब आयेंगे?

राम ने सबरी
के फल खाए,
राम जटायु 
पार लगाए,
राम गए 
उत्कल के जंगल,
राम चले
मलयागिरी के पार,
राम कहे 
पर यहाँ ना आए,

राम रुके थे 
पंचवटी मे,
राम दंडकारण्य 
मे दौड़े,
राम नर्मदा 
तट मे डूबे,
राम सत्पूरा 
चढ़ कर लांघे,

राम के रस्ते 
हम ना आए!

Tuesday, 6 June 2023

हाथ पर हाथ

धर कर बैठे 
हाथ पर हाथ,
बंद पलकों के
छ्द्म द्वार,
झुका हुआ 
थोड़ा कपार,
पकड़े बैठे 
क्षणिक उद्गार,
अन्तर के विचलित 
पारावर,
माया की 
लोलुपता चाहे 
और अधिक 
विस्तार, अपार,
कर्म नया 
होने को आतुर,
करती है यलगार
राम से दूर 
तोड़कर सेतु,
आज रहा ललकार,
कुछ क्षण को 
रुका रहे संसार,
आज सहो
क्षण बैठे-बैठे 
अन्दर के धिक्कार,
राम की लीला 
राम मिटाए, 
राम रहित 
अंधकार!

Saturday, 3 June 2023

आप नहीं समझोगे

सर आप 
नहीं समझोगे,
मेरी बातें 
मेरी समझ 
मेरी situation,

मै ब्रह्म ज्ञानी हूँ 
सर आप नहीं जानोगे,
मै अन्तर्यामी हूँ,
आप मेरे सामने 
बच्चे हैं,
अभी अकल के 
कच्चे हैं,
कमरे मे बैठे रहते हैं 
लोगों से 
कहा ही मिलते हैं,

सर बोले की 
राम आप तो 
दयालू हैं,
मेरे ऑफिस मे
आए हैं,
समय बहुत ही 
थोड़ा था 
पर मेरी खातिर 
आए हैं,
आए कितने ही 
मेरे पास,
आकार 
खाकर पीकर
चले गए,
आप ही राम से 
पहले जो 
अपने को ही 
समझ गए!😁

पागल

पहली बार 
बने हैं पागल,
पहली बार 
चढ़ा है भूत,
पहली बार 
पढ़ाई की है 
जाना है कुछ 
और बहुत,

पहली बार ही 
समय दिया है,
माया से कुछ 
आगे बढ़,
पहली बार ही 
माया को 
पाया है 
अपने पैरों तर,

पहली बार 
आवाज उठाई,
पहली बार 
किया अपमान,
पहली बार 
दरवाजे से 
दूर भगाया 
मैंने जान,

पहली बार का 
नशा बड़ा है 
पहली बार का 
पागलपन है,
राम के छोड़ कर 
आया हूँ मैं,
पहली बार 
भरमाया हूँ मैं!

शिद्दत

इतनी शिद्दत न दो 
की बिगड़ जाऊँ,
मैं राम से भी 
तुम्हारे लिए लड़ जाऊँ,

मैं किसी और से बातें 
करना छोड़ दूँ,
मैं बातों को हर 
तुमसे जोड़ दूँ,

किसी और छोड़कर 
आओ ना मेरे पास,
मैं औरों से मिलकर 
थोड़ा अकड़ जाऊँ,

हर काम को पूछकर
मुझसे किया न करो,
कि मैं हाल पूछने मे
हिचक जाऊँ,
आयतें मेरे नाम की 
पढ़ती हो क्यूँ,
मैं अयोध्या छोड़कर 
अब किधर जाऊँ?

इन्तेज़ार मेरे फोन का 
करने लगे हो,
मै कैसे किसी 
तकिये से लिपट जाऊँ,
मै जानता हूँ की 
काबिल हो तुम 
लंका जलाने के,
पर विभीषण हूँ मै
कैसे को चुप रह जाऊँ,

मेरे बिस्तर पर लेटकर 
आंसू बहाते हो,
मैं दिन मे कैसे 
नजर आऊँ,
तुम्हारा नाम लेकर 
मुझे पहचानते हैं लोग,
मै चाँद क्या देखूँ 
और छुप जाऊँ?

इतनी सिद्दत से ना चाहो 
मुझको चाहने वाले,
मै फिक्र भी करूँ 
तो सम्भल जाऊँ!


प्रचार

पहन-ओढ़कर 
खड़ी हैं लड़कियाँ 
बाजार मे
छपी हैं इश्तेहार मे,

आज के रसूख को 
उठा रही बाजार से,
बता रही हैं 
क्यूँ बिका वो,
जो बिक रहा है 
जोर से,
क्या है जरूरतें मेरी 
बनी हैं जो पहाड़ से,

पहन ओढ़ के लकड़ियां 
खड़ी हैं हर अखबार मे!


Thursday, 1 June 2023

मातृ-भाव

माँ बन गई 
कौशल्या,
पूछा नहीं 
कहा कुछ ना,
माँ ही बनी 
सुमित्रा मेरी,
जन सेवा का 
ज्ञान भरा,
माँ ही बनी 
कैकयी आगे,
मुझको जग मे
त्याग दिया!

राम-खड़ाऊ

राम अयोध्या 
मे भी थे,
राम चले थे 
वन को भी,
राम रुके थे 
चित्रकूट मे,
राम रमे थे 
मन को भी,

राम भरत 
मे राजा थे,
राम लखन 
मे प्रहरी भी,
राम मंथरा-माता थे 
राम कैकयी 
जननी भी,

राम नरेंद्र
बन बैठे हैं,
राम अरविंद सम
विरोधी भी,
राम बोस के 
साथ चले थे,
राम रहे 
सावरकर भी,

राम सिया से 
नाजुक थे,
राम कौशल्या 
की ममता भी,
राम माँ सबरी
की सीमा थे,
राम जड़वत 
मात अहिल्या भी,

राम जनक
के थे संकल्प,
राम शिव-धनुष 
प्रत्यंचा भी,
राम ही परशु
धारण करते,
राम जनकपुरी
की सज्जा भी,

राम दिव्यकीर्ति 
बन सौम्या पढ़ाते,
राम ही ओझा 
बन गुर्राते,
राम ही खान बन 
जन तक पहुँचे,
राम-अलख जल 
किशोरों को 
विनोद सुनाते हैं,

राम प्राचार्य अशांत 
बन बांचे,
राम ही आदिपुरुष 
बन नाचे,
राम ही शास्त्री 
बागेश्वर बाबा,
राम ही रामदेव 
योग की आभा,

राम कबीर के 
दोहे गाते,
राम रैदास बन 
चमड़ा काटे,
राम फकीर-सा
मांग के खाते,
राम अंबानी
बनकर लुट जाते,

राम सद्गुरु 
राम रविशंकर,
राम आनंदमूर्ति
राम ब्रह्मवत,
राम ही खोज 
राम ही उत्तर,
राम ही स्थिर
राम बहु-अन्तर,

राम अशोक 
राम ही अकबर,
राम प्रताप 
राम तदनंतर,
राम ही क्लाईव
राम गवर्नर,
राम विक्टोरिया
राम जवाहर,

राम ही 'बापू'
राम ही हिटलर,
राम ही चर्चिल 
राम सावरकर,
राम ही बुद्ध 
राम ही कृष्णा,
राम ही हिंसा 
राम ही तृष्णा,

राम बसे हैं 
कहाँ-कहाँ?
राम ने रोका 
किस-किस को?
राम हर जगह 
व्याप्त हुए,
राम ने चाहा 
जिस-जिस को!



ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...