Friday, 27 June 2025

सुधार

तुम सुधर न जाना 
बातें सुनकर जमाने की, 

कहीं धूप में जलकर 
सुबह से नजर मत चुराना, 
ठंड से डरकर 
नदी से पाँव मत हटाना, 
कभी लू लगने पर 
हवा से गुफ़्तगू न भुलाना, 
किसी की नाक बहने पर 
घर पर मत बुलाना,

कोई कह दे अगर 
करेले की लड़ाई, 
तुम हंस लेना खुलकर 
करेले से न लड़ जाना, 
कोई नमस्ते कहे तो 
खुशी रहो कह देना, 
किसी को हाथ जोड़कर 
नहीं मुस्कुराना, 

तुम्हारे भक्त हो गए हैं 
गंगा के घाट और कुंड, 
सुबह आरती में तुम 
नहाकर न चली जाना, 
तुम्हारे तिलक पर 
सभी की नज़र है,
तुम अपनों की सुनकर 
भगवान को मात भूल जाना, 

तुम्हारे अन्नपूर्णा को 
तुम्हारा इन्तेज़ार है, 
कभी भीड़ से डरकर 
चुप न हो जाना,
किसीको पता नहीं 
तुम कोहिनूर हो, 
मेरा दामन छोड़कर 
कहीं मुकुट न जड़ जाना,
लोग जी रहे हैं 
तुम्हारा जीना देखकर, 
तुम उनकी सुनकर 
जीना न भूल जाना,

कोई कद कोई काठी 
वहाँ पहुँच नहीं सकती, 
कोई रंग-रूप की बात 
तुमसे पच नहीं सकती, 
तुम पैर ढंकने के लिए 
पाजामे मे न फंस जाना, 

'कुत्ता' कह दिया तो 
बड़ी बात बनी होगी, 
खाना साथ न खाया तो 
उनकी भूख मरी होगी, 
कभी बकरियों की चोरी 
पर हुआ हो घमासान, 
कोई भूत बनकर डर गया 
चाहे निकल जाए जान, 
तुम उनकी तंग-दिल बातों को 
कभी दिल पर न लगाना, 

तुम्हें देखकर कई 
अरमान उठते होंगे, 
तुम्हें बताकर कई 
बच्चे लड़ते होंगे, 
कोई तोड़ देगा टीवी 
अपनी नई घर की आज 
कोई प्रेम का अपने 
बतायेगा राज, 
तुम बच्चों की टोली में 
बड़ी मत हो जाना!

नजर

मुझे देखती हैं 
अब हर पहर, 
तुम्हारी ये 
झरोखों सी नजर,

पूछती हैं सवाल 
मांगती हैं जवाब,
मेरे होने की वजह 
मेरे जीने का ख्वाब,
ये कैसी कहानियों 
खुली है नहर,

इसमे है मेरा शहर 
दिन रात दोपहर,
मेरा ऑफिस 
मेरा घर, 
मेरे किचन का खाना 
मेरे दोस्तों का चिढ़ाना, 
मेरे बस की सीट 
मेरे ट्रेन की टिकट,
मेरा सोना 
मेरा जगाना, 
मेरा सूर्य नमस्कार
मेरा ऑडिट का उधार, 
मेरा खानदान 
मेरे मुहल्ले का पान, 
लावा और सुमन 
मेरा शबर, मेरा चैन 
मेरे करवटें वाली रैन,
मेरे गंगा की सुबह 
प्रयाग की शाम, 
मेरे अस्सी और राजघाट 
मेरा लस्सी मेरा चाट
मेरा सिनेमा का पर्दा 
मेरा 90 दिन का वादा,
मेरी सीता और चालीसा 
मेरे हनुमान और गीता, 
मेरा शक्तिमान 
और व्योमकेश
मेरा साधारण सा वेश, 
तुम्हारी शॉर्ट और 
सुबह का तिलक, 
हमारी रात भर की बात 
तुम्हारी शैतानी 
और शबाब, 
मेरे भारत के सब काम 
मेरे तुलसी मेरे राम,
मेरे चाक की कुम्हार 
मेरी सागर की लहर 
तुम्हारी नजर
ये हैं मेरी नज़र!

Friday, 20 June 2025

शिव-शक्ति

तुम शक्ति मैं शिव 
तुम ब्रह्मास्त्र मैं गांडीव, 
तुम गंगा का 
विस्तार प्रलयंकारी
मैं स्थित जटाधारी,
तुम चांद, मैं चंद्र-शेखर
तुम नदी, मैं सागर,

तुम गगन, मैं क्षितिज 
तुम अगन, मैं जल,
तुम खनन, मैं खनिज 
तुम पवन, मैं बल,
तुम खुदा , मैं हाफिज 
तुम धरा, मैं अचल,

तुम गुमान, मैं मुस्कान 
तुम आवेग, मैं समाधान,
तुम खुलापन, मैं विधान
तुम सलीका, मैं नादान, 
तुम किलकारी, मैं ध्यान 
तुम क्रोध, मैं शैतान

तुम प्रयास, मैं छल
तुम आज, तुम कल,
तुम रास्ता, मैं मंज़िल
तुम अवतार, मैं हासिल, 
तुम प्रिया, मैं नाम
तुम सिया, मैं राम!





 

Tuesday, 17 June 2025

नींद

मेरी नींद ले गई 
ख्वाबों की सच्चाई, 
मेरे साथ आ गई है 
जबसे मेरी परछाई, 
मेरे कहने से सुनने
के बीच फैली है,
एक लंबी दास्तान 
कई मिलों की तन्हाई, 

मेरी आने वाली सुबह 
मेरी ढ़लने वाली शाम, 
मेरे पढ़ने का तरीका 
मेरे चलते-फिरते काम, 
मेरी कुश की चटाई
मेरी दोपहर के ध्यान, 
कुछ धुले हुए कपड़े 
कुछ पर्दों का कलाम, 

तुम सभी में हो गई हो 
तुम सब समय पड़ी हो, 
मेरे लेकर सारे आराम 
तुम हो गई कोई काम, 
मेरी नींद भी नहीं 
और समय का नहीं ध्यान, 
तुम रात की नमाज 
और सुबह की इबादत, 
तुम शाम आरती 
तुम गोधूलि का राम!

Friday, 13 June 2025

जादूगर

तुम हो कोई जादूगर 
तुम्हारा होना है असर, 
तुमसे मिला नहीं, 
आया कभी पास भी नहीं, 
बस तुमने ली खबर 
मैं हो गया बेख़बर,

धीरज से हुआ मैं बेसबर
मदहोश हो गया हूं शाम-दोपहर, 
पम्मी का नाम था यूँ जहर 
तुमने छुकर कर दिया शहद,

ये नदी, ये झील 
ये सागर, ये लहर,
ये थे अपने मेरे 
हमसफर,  हमनफज,
ये शहर, ये सड़क 
ये मंदिर और नहर, 
ये सभी दोस्त थे
कल तक, हर पहर, 
अब चुप हो गए हैं
मुस्कुरा भर रहे हैं 
क्यूँ मुझे देखकर, 
बियाबाँ हो गए 
अब तुम्हारे बगैर,
पड़ी है तुम्हारी 
ये कैसी नजर,
क्या कर दिया है
कहो जादूगर?

मेरे राह सकुचाते उधर
छुने को चाहें तुम् चवर,
आस्मां निहारे तुम्हारी झलक,
गले से लटक कर
बगीचे की डाल,
पूछे तुम्हारा 
चिढ़ाकर के हाल,
खिंचाई करत हैं
आम की बउर, 
अटक जात है माथे
गजरा बनकर,
रस्ता रुकाके
चौराहे क पीपल,
कहत बाड़े बाबु
देखाता न आजकल?
सबपर तुम्हारी 
लगी है नज़र, 
कैसे ये करती हो
तुम जादूगर?

सबेरे उठाकर के
पूछ ता मम्मी,
आई मेहरिया 
भुला जईबा पम्मी,
मुझसे मेरी बाँसुरी 
भी अलगाई, 
फूंका जो मैंने 
हँसी-खिलखिलाई,
झाड़ू लगावत
कहत बानी भउजी,
तकिया के छोड़ा 
 लियावा जा सब्जी,
मामी तो कहती 
तनी मुस्किया के,
केसे बतियावत 
रहे रतिया के?
बहन कह रही
लगाकर के मुक्का,
मने मन छुहाड़ा
मने मन मुनक्का,
सबको तुम्हारा 
लगा इंतजार, 
जादूगर तुम्हारा है
कैसा कमाल?












Monday, 9 June 2025

दिहाड़ी

एक दिहाड़ी काटकर
मुझे घर बनाना है,
एक दिहाड़ी रोककर 
मुझे छत लगाना है,
एक दिहाड़ी खोदकर 
रोटी जुटानी है,
एक दिहाड़ी नापकर
चुल्हा जलाना है,
एक दिहाड़ी चलाकर
उनको दिखाऊं फिल्म, 
एक दिहाड़ी जलाकर 
बच्चों को दे दूं ईल्म, 
एक दिहाड़ी जोड़कर 
संघर्ष करना है,
एक दिहाड़ी तोड़कर 
कोई फार्म भरना है,
एक दिहाड़ी मोड़कर 
ठेके पे चलना है,
एक दिहाड़ी गाड़कर 
बालकनी मे मालिक के
मनीप्लांट उगता है,
एक दिहाड़ी जब्त कर,
वो पॉलिसी किनता है,
मैं काट लुंगा आज 
कुछ बच्चों की दिहाड़ी,
मैं उड़ा हूं आज 
लगा पंखों को पहाड़ी!



प्रणाम

एक बार फिर 
बिना मतलब 
प्रणाम लिख दो,
तुम मेरे नाम 
कोई बात लिख दो,
हम बार-बार झांकते हैं
तुम्हारे मैसेज बाॅक्स मे
गाहे-बगाहे 
एक मुस्कान लिख दो,

कुछ मांग लो अधुरे 
ख्वाहिशों की फेहरिस्त से,
कुछ सुना दो अपने
महकमों के किस्से, 
कुछ शिकायत होगी तुम्हारी
इस दुनिया जहां से,
कुछ थामी होगी जुर्रत 
तुमने एक हाथ से,
कुछ खुलने वाली 
जुबाँ तुमने ऐंठ दी होगी,
किसी अबला कि खातिर 
फिर कोई तकलीफ ली होगी,
अख़बार समझ मुझको
कोई पैगाम लिख दो!

अधूरे प्रेम पर तूमने
कई टेसू बहाए हैं,
मेरी माँ के आँचल से
महज काटे चुभाए हैं,
मेरी बाहें पकड़कर 
खींचने का मन तुम्हारा था,
मेरे कंधों पे सर रखकर
बहुत रोना-बिलखना था,
मेरे चुपचाप जाने से
छुआ ब्रह्मांड भर का शोर,
कई बातों के उत्तर मे
मिलें प्रश्नों के खुले छोर,
मुझे इंकार कर मेरे लिए 
एक अंजाम लिख दो!


Saturday, 31 May 2025

भ्रम जाल

कह दिया मजाक मे
देह के उल्लास में,
विनोद कर लिया
या किया था रंज,
और अलग-थलग 
जब हुआ बेरंग, 
छा गया भ्रमजाल
हो गया मैं तंग,

जो रचे किरदार 
जो दिया संवाद, 
आ गया बनकर
पूर्ण रुप विवाद, 
बना शब्द बाण
कर दिया प्रहार
भंग करके रंग 
छेड़कर विषाद,

अपने भीतर अनंत
गूंज उठा नाद,
गगनचुंबी गर्जन
अनंतिम हाहाकार, 
विप्लव विशाल 
प्रचंड पारावार, 
अट्टहास कठोर
आत्म पर आघात!

हिम्मत

नहीं रोकने की 
जुटाई वो हिम्मत, 
नहीं गालियों से 
जूझने भर थी हिम्मत, 
नहीं ही मिलाया
नजर भी विदा पर,
नहीं देखने की
आंसुओ की थी हिम्मत,
किया था जो वादा
निभाई न हिम्मत, 
तुम्हे गले भर लूं
दिखाई न हिम्मत, 
चलने को होगी 
बड़ी राहें अलग-थलग,
कहां मोड़ने की थी
राहों की हिम्मत!

वो गली

कैसे उस गली में
आऊंगा चलकर, 
जहां पर तुम्हारे 
हाथ धरकर बढ़ा था, 
कैसे वो देखूँगा 
मैं सब नज़ारा, 
जहां संग तुम्हारे 
मिला नजर घुमा था,
वो राह क्या होगी 
जहां तुम मिलोगी, 
कहां से चली थी 
कहां तक रहोगी, 
कहां बाज़ुओं की 
ऊंगली-सी दिखाकर,
मेरे खामोशी का 
शबब पूछ लोगी,
क्या कहकर बढ़ेंगे 
कदम तुमसे आगे
तुम मेरे वादों की
खबर पुछ लोगी!

Sunday, 25 May 2025

अकेली

जिन राहों पर वो साथ हमारे 
हाथ पकड़ कर जाती थी,
उन राहों पर कल खड़ा रहा
वो राह अकेली जाती है,
जिन किस्सों से मैं तंग हुआ
जो बार-बार दुहराती थी,
अब मन में उनकी ख़लिश रहे
बस याद अकेली आती है,
जिस दुकानदार के चाय के प्याले
हम साथ-साथ मे पीते थे,
जिनके खातों की मांग हमारी
कई माह रह जाती थी,
उनके पैसों को चुका किया
पर स्याह अकेली जाती है!

जिन हँसी-ठिठोली को गपशप से
हाथों-हाथ बनाते थे,
जिन बातों की आह पकड़
हम आंसूं रोक न पाते थे,
जिन वादों की कसमें हम
होंठ मिलाकर खाते थे,
उन जनम-जनम के वादों की
अब साख अकेली जाती है!

जिन बातों के फोन में चर्चे
कंबल मे छुप जाते थे,
जिन रातों के वक्त 
चांद के साथ निभाते थे,
जिन नींद के आगोश को
हम लोरियों-सा गाते थे,
जिन सिसकियों को हाथ धर
हम चूमते और पीते थे,
उन स्याह अंधेरी रातों की
बिसात अकेली जाती है!

जिन चौराहों के चाकों पर
हम आते-जाते मिलते थे,
जिन मोड़ों के सिग्नल पर
हम रुठकर पैदल चलते थे,
जिस स्टेशन के घाटों पर
हम साथ रोटियाँ खाते थे,
जिन कार्यालयों के उपवन से 
फूल तोड़कर लाते थे, 
जिस समय की कुछ पाबंदी मे
हम घड़ी से दौड़ लगाते थे, 
उन सीढियों के जीनों से 
मुलाकात अकेली जाती है!











ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...