Thursday, 2 June 2022

ठठेरा और कुम्हार

लिखता है
कोई हाथ से,
रज–रज
एक कविता,

ठोक–ठोक के
करता है,
कोई उद्दंड
मूढ़ को ठंडा,

दोनो करते
शीतल जल का
पात्र बनाने
की कोशिश,

पिघलाकर कोई
करे जतन,
पानी मे एक
घोलकर कण,

माटी के
पुतले अनेक,
गुरु देते उनको
रंग भेद,
दोनो के
अन्तर्मन को
करते थोड़ा गहरा,
कुंभकार और ठठेरा!🙏

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