केंद्र मे सत्संग,
केंद्र से हटकर
है जरा विध्वंस,
केंद्र के सब ओर
केंद्र के हैं छोर,
केंद्र से अर्जित
उर्मियों के डोर,
जब केंद्र परिभाषित
और आनंदित,
मध्य मार्ग सुगंधित
सत्य और पुलकित!
झूला झूले रज का कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच करते नृत्य जुगलबंदी...