Monday, 1 August 2022

छलिया

ये मिट्टी की पुट्टी
इधर उधर ढुल जाती
कुछ ले आती
सागर मे गोते खाकर
खर–पतवार, शैवाल,

बार–बार कुछ खाकर
उल्टा–सीधा झंखाड़,
उल्टी कर देता कहीं भी
और रहता उसे निहार,

ये छलिया
60 किलो का भार,
इसके नखरे अपार
ये छलिया
खुद का ही मझधार!

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