Sunday, 27 November 2022

मेरी नज़र

एक शहर हो
और मेरी नज़र हो,
मैं आऊं पैदल
और जाऊं इधर–उधर,

रूमी दरवाजा हो
भूलभुलईया हो,
मानस मंदिर
कबीर मठ हो,
मेरी पेशानियों पर
उसका असर हो,

लोग वहां के
तहजीब वहां की
वहीं का गूगल
तस्वीर वहां की
वही का बाराती हो
वहीं की लगन हो,

एक शहर हो,
मेरी नज़र हो!

No comments:

Post a Comment

अधिकार

तुम पर है अधिकार  तुम्हारे होने का चलने का,  तुम्हारे बातें मुझसे करने का  और फिर तुमसे मिलने का,  यह बोलो और फिर शांत रहो मैं सोचूँ और तुम ...