Thursday, 5 January 2023

मिट्टी का घर

यह मेरा मिट्टी का घर
चलता है मिट्टी के ऊपर
मिट्टी गिरती इधर–उधर
मिट्टी के घर, रहता वो पर,

मिट्टी की धर डगर चला चल
आकर बैठा भी मिट्टी पर,
मिट्टी पर एक और परत धर
मिट्टी से डरता धरता पग,

मिट्टी मे जब ही मेरा घर
तो क्यों मिट्टी को धरता भर कर,
मिट्टी पड़ी है मन के ऊपर
मिट्टी मे धूसरित होता मर! 

No comments:

Post a Comment

ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...