Monday, 4 February 2019

बिरजु की माँ

मुझे फिर से आज
बृजेश की माँ दिखी

वही लाल रेशों वाली
फैली आँखें,
जो सुख गयी थी,
कितनी रात जागे।

आँखों से टपकता
वही ममत्व,
दर्द की चायछन्नी से छना
समान घनत्व।

वही छरहरी
कुपोषित काया,
मिलों तक रोज़
चली हुयी काया,
नटनी की तरह
बचपन से चली,
बीच-बीच मे
थोड़ा खाया।

बिरजु की माँ
कबसे डटी थी,
आज दिनभर वो
Aadhar की line में खड़ी थी।

लघु-विचार

दूसरा गाल

मुझे दूसरा गाल पसंद है,
क्यूँकी उसपर पड़ा तमाचा
बापू को लगता है,
और हम दोनो सुधार जाते हैं।


Agent vinod

मै agent विनोद हूँ,
मै लोगों के गंदे काम मे,
आगे आ जाता हूँ,
क्यूँकि मुझे कोई पहचानता नहीं,
और ना ही मै किसीको।

दूध

मैंने देखा दूध
खौल रहा था,
उफान मार रहा था,
कुछ बुलबुले एकजूट होकर
ऊपर की मलाई को,
फाड़कर बाहर निकल रहे थे,
निकल रहे थे,
निकल रहे थे,
निकल ही रहे थे,
मैंने देखा वो निकले नही,
दूध बस धीमी आँच पर पक रहा था।


चुम्बन


तुमने काँटों की डाली देखी,
मख़मल सुर्ख़ गुलाब ना देखा।
तुमने घटाएँ काली देखी,
बादल का उन्माद ना देखा।

तुमने देखी हँसी-ठिठोली,
अंदर का अवसाद ना देखा।
तुमने आँखें सूखी देखी,
सूखे आँसू की धार ना देखा।

तुमने देखी भाषा मेरी,
पर मेरा व्यवहार ना देखा।
तुमने देखा वक़्त लगा है,
पर मेरा इक़रार ना देखा।

तुमने देखा जिरह बड़ी है,
अपनेपन का एहसास ना देखा।
तुमने देखा पत्थर-मूरत,
उसपर गहरा घाव ना देखा।

तुमने अपना बचपन देखा,
उसमें मुझको पास ना देखा।
तुमने अग्निपरीक्षा देखी,
सीता का विश्वास ना देखा।

तुमने मेरा होंठ टटोला,
बंद आँखों का भेद ना देखा।
चुम्बन तुमने फीका पाया,
रोम-रोम उल्लास ना देखा।

तुमने Aadhar connection देखा,
ठिठुरा, कुम्हला हाथ ना देखा,
तुमको मैंने कितना देखा,
पर तुमने इक बार ना देखा।

Monday, 21 January 2019

अबकी उसको माफ़ ना करना......

वो फिर आएगा,
रोएगा, मिमियाएगा,
सौ बार दुहाई देगा,
हर नाम खुदा का लेगा ।

बिछड़े प्यार के परदे मे,
Sympathy ढूँढेगा,
दर्द तुम्हारा नहीं गुनेगा,
तुमने blame कर देगा।

उसके बिखेर टुकड़ों मे
तुम Fevicol ना बनना ।

अबकी उसको माफ़ ना करना......

गांधी के क़िस्से गाएगा,
कविता कोई सुनाएगा,
गुजरी माँ की बात तुम्हारी,
बार बार दुहराएगा ।

पीर कोई भारत का बनकर
सत्य-सत्य चिल्लाएगा,
डरकर शांत का ढोंग करेगा,
'अहिंसा' धर्म बताएगा ।

उसके बहकाने में आकर,
'भारत की जय' मत कहना ।

अबकी उसको माफ़ ना करना......

तारीफ़ करेगा बार-बार,
हर बात, ठहाके मार-मार,
तुम ऐसी पहले ना थी,
यही दिखाएगा, बेकार ।

और तुम्हारी हर हरकत पर
कविता कोई लिखेगा,
निजी जिरह की छुपी-सी बात
Blog पे सनाम कह देगा,

उसकी कविता में तरस देख,
तुम दिल को साफ़ ना करना ।

अबकी उसको माफ़ ना करना......

माँ

चाय-पराठे की मिठास मे
नमक की चुटकी जैसी माँ,

याद आती है दरी-कटोरी
बड़की-रोटी जैसी माँ ।।

भूखे पेट ही ऑफ़िस जाते
टूक्की-रोटी जैसी माँ,

आँटे की छोटी लोई से,
राजा मुझे बनाती माँ ।।

हमें नहलाने एक भगोना
तड़के पानी गरम किए,
ठंडे पानी, भीगे बैठी
पत्थर खुज्जे जैसी माँ ।

गरम दुपहरी जाग-जाग कर
और थकावट बढ़ा लिया,
लू और प्यास को सबक़ सिखाती
ठंडी गगरी जैसी माँ ।

कपड़े छोटे,थोड़े खाने
सबको बाँट खपा देती,
अंदर जूने बसन समेटे
सिलती कथरी जैसी माँ ।

दिन की धूल, शाम की सुस्ती,
शरबत देकर मिटा दिया,
रात अन्धेरे, रगड़ गाल पर
कडुआ-तेल के जैसी माँ ।

मेरी कविता मे बसी हुयी,
राम-भजन के जैसी माँ ।

राधा

मुरली सुनकर, छत पर छुपकर
धीरे से चढ़ जाती वो,

मम्मी की पुकार सुनकर,
धीमी आवाज लगाती वो,

मन मसोसकर, phone काटकर
मन ही मन पछताती वो,

बात में गुम हो, दूध खौलता
छोड़ के आती वो,

मम्मी की डाँट का हुबहू,
नक़ल बनाती वो,

राम नाम का ध्यान धरे,
सीता-सी अघाती वो,

स्कूल से आकर अंतर मन से,
मुझे बुलाती वो,

बातें करती, सपने बुनती,
ख़ुश हो जाती वो,

तिनकों के घरौंदो से चुन-चुन कर,
मुझे भुलाती वो,

उधौ की बात को सच मानकर,
कृष्ण मिटाती वो।

Friday, 11 January 2019

सोन चिरईया

चीं चीं करती सोन चिरईया,
मेरी प्यारी सोन चिरईया,
हर दम गाती सोन चिरईया ।

बड़ा बहेलिया जंगल आया,
उसने अपना जाल बिछाया,
थोड़ा सा तुमको धमकाया,
आँख दिखाया, रौब जताया ।

तुम्हारे गाने को fake बताया,
और मंशा पर प्रश्न उठाया,
कई जतन कर तुम्हे घुमाया,
कातर करके तुम्हे भगाया,

फिर भी उसका दाना खाकर,
तुम फुर्र-फुर्र उड़ जाती हो,

सोन चिरईया,सोन चिरईया
तुम हँस कर बात उड़ाती हो।

चीं चीं ऽ ऽ ऽ करके गाती हो।

बड़ा-सा जब stage सजाया,
गाने को तुमको बुलवाया,
और भीड़ की जंगल को,
न्यौता देकर भी कहलाया।

पर तुम तो दिन भर सोयी थी,
देर रात तक अलसायी थी,
Performance के लिए तुम्हारी,
तैयारी ना हो पायी थी,

सुबह हुआ जब मंज़र आया,
नहीं तुम्हारा मन घबराया,
इक बंदर का मस्त-कलंदर,
तुमने सबको नाच दिखाया,

पीछे की कुर्सी पर बैठी,
कैसा रास रचाती हो ।

सोन चिरईया,सोन चिरईया,
तुम सबके मन को भाती हो।

सोन चिरईया,सोन चिरईया,
मैंने नहीं समझा था अबतक,

तुम झुर्मठ से इठलाती हो,
छुपकर तुम गाना गाती हो,
सबका मन तुम बहलाती हो,
मुझसे ही बस शर्माती हो।

क्यूँ तुमने मुझको भरमाया,
अपना गाना नहीं सुनाया,
क्यूँ अपनी किस्सों का तुमने,
मुझको हिस्सा नहीं बनाया ?

यही सोचकर ग़ुस्सा था मै,
पर ग़ुस्सा भी टिक ना पाया,
अपने अंत:चक्षु खोलकर,
मैंने तुमको अपना पाया।

सबको धर्म का बोध कराके,
तुम 'शृजाम्यहम्' दर्शाती हो,

सोन चिरईया,सोन चिरईया,
मेरी कविता में घुल जाती हो।।
सोन चिरईया,सोन चिरईया,
सबसे प्यारा तुम गाती हो।।

Thursday, 29 November 2018

कुम्भकर्ण

"मुझे लगा की
कुम्भकर्ण बड़ा है,
क्यूँकि वह
दिखता बड़ा है।

मैंने confirm भी
किरन से किया है,
क्यूँकि उसको तो
सबकुछ पता है।

मैंने कुम्भकर्ण से
प्यार किया है,
यह बात "शायद"
उसको पता है ।"

क्या कुम्भकर्ण को
तुमने बताया है ?
"नहीं ऽऽऽऽऽऽ !
उसको तो बस
सोना होता है ।"

तुम्हें ऐसा क्यूँ लगा है ?

"मैंने पूछ लिया है !"

किससे ? कुम्भकर्ण से ?

"नहीं ऽऽऽऽऽऽ !  किरन से !
क्यूँकि उसी को तो
दुनिया मे सबकुछ पता है।"

Thursday, 1 November 2018

तुम क्या सोचती हो ?

तुम्हारे ज़हन मे
बहुत खलबली है,
तुम्हारे नज़र मे
बड़ी जुस्तजूँ है,

क्यूँ अपनी घुटन को
हवा दे रही हो,
क्यूँ भेद अपने
जताती नहीं हो ?

तुम क्या सोचती हो, बताती नहीं हो !

तुम्हारे कंधों पे
बाज़ू चढ़ाया,
तुमको ही मैंने
गले भी लगाया,

तुम्हारी scooty पे
मै पीछे बैठा,
मंदिर के चौखट से
तुमको ही देखा,

तुम क्यूँ अब मंदिर मे
आती नहीं हो,
मेरे आग़ोश में भी
समाती नही हो,

पर कंधों से अपनी
मेरी ये बाँहें,
क्यूँ कर कभी तुम
हटाती नहीं हो ?

तुम क्या सोचती हो, बताती नहीं हो !

बहुत कुछ है जो तुम
बताती नही हो,
पर लगता है यूँ
कुछ छुपाती नहीं हो,

करती थी बचपन से
Music की classes,
रामायण के चर्चे,
Cartoon की बातें,

सो जाती थी पेड़ों की
झुर्मुठ में खोकर,
लड़ती थी भाई से
खुलकर-झपटकर,

सुनाती हो क़िस्से
मन मे खिल-खिलाकर,
पर क्यूँ लबों से
मुस्कुराती नहीं हो ?

तुम क्या सोचती हो, बताती नहीं हो !

Tuesday, 25 September 2018

Rolle's Theorem

गर तुम मुझसे,

करती थी प्यार तब भी,
करती हो प्यार अब भी,
तो है इस दरमियाँ ही,
तुम्हारी बेख़ुदी की हद भी,

क्यूँकि तुम विचारों से
निरंतर बही हो।।

इस बेख़ुदी की हद से,

बदली है तुमने रूख भी,
ले ली है तुमने सुध भी,
तो हाँ उस घड़ी ही,
तुम थी गयी ठहर भी,

क्यूँकि तुम स्वभाव से
विचलित नहीं हो।।

इस प्यार की वजह से,

तुझमें बसा खुदा भी,
मुझमें बसा खुदा भी,
और हो गया ये प्यार,
ज़र्रे से बढ़के रब भी,

क्यूँकि तुम प्रभाव से,
अब संकुचित नहीं हो।।


Sunday, 16 September 2018

PhD in Humanities

जब तलक तुम bachelor हो
Course कोई भी करो,
पर Major करने से पहले
एक बारी सोच लो !

क्यूँकि
bachelors मे कुछ भी करो,
Nobody cares,
But once you want to Major,
Your "social" background matters.

ये Major का विषय
तुम्हारे PhD को topic देगा,
पहचान तुम्हारी और तुम्हारे
ज्ञान का द्योतक होगा।

यही कहेगा कि तुम कितना
ध्यान दोगे काम पर,
Doctor यही बनाएगा
और जुड़ेगा नाम पर।

Major करने के बाद
कुछ वक़्त research ज़रूरी है,
और JRF भी ले लेना
गर पैसों की मजबूरी है।

क्योंकि नहीं पता तुमको
कब 'प्रकाश' चला जाए,
और तुम्हारी funding को
'ईरानी' केतु खा जाए।

फिर किसी भी college के
Admission ka पर्चा भरना,
और भाजपा नहीं पसंद तो
JNU नम्बर १ रखना।

Clear करके exam
Viva-voice मे बात करना,
राम नाम लेकर कॉलेज मे
फिर तुम प्रस्थान करना।

पाँच साल का अनुभव तुम्हारा
ज्ञान से भरा होगा,
और यक़ीनन आगे बढ़कर
भाग्य भी स्वरा होगा।




ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...