क्या माया?
कौन समझ पाया?
कैसा है सत्य
जो हर कोई भरमाया?
जानता है जो कोई
वो क्या जानता है
वो क्या छोड़ बैठा
वो क्या मांगता है?
यह किस समय की
भूख मे,
हर एक दौड़ता है,
कौन हाथ रोपकर
क्या क्या समेटता है?
क्या रूप है क्या छाया
यह कौन समझ पाया?
झूला झूले रज का कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच करते नृत्य जुगलबंदी...