Sunday, 10 March 2024

गलत

यह गलत है की 
उनके अनुसार न हुआ,
जो हुआ भी तो उनको 
मंजूर न हुआ,
उनको कहा भी तो 
मुझे डर से देखने लगे,
वो चले कुछ कदम 
मुड़ के झांकने लगे,
इस तरह वो मेरा 
हाथ थामने लगे,
दामन था मेरा 
पीछे उड़ता हुआ,
धर के हाथ उसको 
आँख पोछने लगे,
ये गलत है की हम 
उनसे बचने लगे,
आँख और भी थी नम 
उनको पोछने लगे,
माथे का तिलक 
खुद मिटाने लगे,
सब बढ़े एक तरफ 
हम और ही तरफ,
गलत हर गलत 
हम उठाने लगे,
कोटि पग की तरह 
दो पगों की तरफ,
मुट्ठीभर नमक
हम उठाने लगे!

हँसी

तुम्हारी हँसी 
बेख़ौफ़, बेदाग 
बेहिचक,
हर वजह
हर जगह,
हर समय 
हर घड़ी,
मोतियों की लड़ी 
टूटकर गिर पड़ी,

बाँध से छूटकर 
एक नदी चल पड़ी,
पहाड़ों से उतरी 
एक हवा की लहर,
थपेड़ों चमन मे
गूँजाती हुई,
हरे घास के 
तिनकों में लुढ़क,
आज खुदगर्ज हो
गुनगुनाती हुई,

कोयलों की कुहन
बादलों की गरज,
वादियों मे हुई 
साज की अट्टहास,
ये बड़ी बदहवास 
ये खुली बेनक़ाब,

ये किताब, ये जवाब 
ये हिसाब, ये रबाब,
ये खिताब, ये खिज़ाब
ये अनाब और शनाब,
कौतुहल की गुलाब 
लखनऊ की नवाब,

ये शहर की नहीं
ये अब किसी 
शरहद की नहीं,
ये गांव की नहीं
किसी तांव की नहीं,
परिवार की नहीं
मेहमानों के 
सामने भी नहीं,
किचन में कभी
झांकने सी नहीं,

यह दबी क्या कभी
यह किसी से नहीं,
पसंद है नहीं
यह सभी को नहीं,
यह खुदा की हंसी
यह खुदी की हंसी!



पैरवी

करता हूं मैं 
चांद की पैरवी,
ये फैली हुई 
रात की चाँदनी,

यह पूनम है 
रोशनी का सवेरा,
शबनम का दरिया 
गुलों का बसेरा,

यह नहीं दाग-दामन 
हो अंधेरों में ओझल,
रात रोने नहीं हो 
महकने की शोहरत,

घटती नहीं, 
ये बढ़ती नहीं,
चश्म है ये खुदा की 
रोज़ खुलती नहीं,

जुटाता हूं, रोपता हूं 
मैं हाथ में रोकता,
पैरवी चांद की कर 
ज़िंदगी ढूंढता!

Wednesday, 6 March 2024

निर्झर

निर्झर बहता झर्झर-झर्झर 
कर्णों से तर कर अंतर,
ओद ललित शोणित कलकल
आह्लादित मद्य स्फूर्त चपल,

झनझन-झनझन 
झंकृत तन-मन,
सन-सन, सन-सन
पवन की सिरहन,

खन- खन अमृत 
कर्णों की लगन,
अवशोषित तन
विस्मृत जीवन,
आप पलक 
खुलते लोचन,
निद्रा के पल 
अब हुए विरल,
प्रस्फुटित हुआ 
नव-निर्झर! 

Sunday, 3 March 2024

दो साँसे

दो मिनट
कुछ बात करती,
दो से मिलकर 
एक होती दो साँसे,
अतीत की दो साँसे 
भविष्य के कुछ वादे,
आँखों मे नींद को 
दो रात रोकती 
दो साँसे,
दो जिंदगी के दोपहर 
दो शाम की ढ़लान,
दो अलग-थलग सुबह की 
एक जैसी सुबक,
दो परिवार की
दो वक्त की रोटी,
मझला लड़का 
बड़ी बेटी,
दो कन्धों की 
दो जिम्मेदारियां,
एक परिवार की
एक समाज की,
दो अगल-अलग 
राष्ट्र का खाका,
एक राज्य की
एक बनबास की,
एक मथुरा-वृंदावन की
एक कुरुक्षेत्र के द्वन्द की,

दो तर्क-वितर्क मे सिमटी
दो पल मज़ाक की,
हिरोशिमा और नागाशाकी
के बादलों मे गूंजते दर्द की,
दो शहरों मे उगते 
और ढ़लते सूरज की,
दो सौ मिनट मे भी
अधूरी रही बातें 
कई-कई रात की!

वेदना

चीख कर रोई
मैं जागी सारी रात,
कुछ याद आ गई 
मुझे पुरानी बात,

उनके वादे जो 
मेरी चूनर को
फंदा बना देते,
मेरी ख्वाहिश जला
मेरे लिए 
बंदा बना देते,

मेरी मेहनत को 
मेरा वो कोई
दाना समझते हैं,
अपने पांव का 
मुझको महज
ताना समझते हैं,

तुमने सुनि नहीं
मेरे कमरे की वो आवाज,
मैं हूं नही महज
जो तुम देखते हो आज!

Saturday, 2 March 2024

अन्यथा

यह बात दोस्तों की 
यह बात नहीं मतलब की,
इस बात की खाल 
बाल जैसी ही महीन,
इस बात की आयु 
रात का एक पलछिन,

ये कहने की बात 
कोई कहना नहीं था,
इस बात को बताकर 
कुछ बताना नहीं था,
किरदार हैं बातों में 
अस्तित्व तो नहीं है,
संबाद हैं सभी के 
व्यक्तित्व तो नहीं है,

ये बात की जुबां
तेरी बातों से आई,
इस बात की अहमियत 
तुमसे ही है आई,
इन बातों को किसी से 
बताना नहीं है,
महफ़िल में इनको 
उठाना नहीं है,
नजर से ज़िक्र 
कर न देना कहीं पर,
मेरी दोस्तों में फिक्र 
कर न देना कहीं पर,
ये बैठक सफर का
सिरहाना नहीं है,

इन बातों का कोई 
ठिकाना नहीं है,
इन बातों से कुछ भी 
दिखाना नहीं है,
इन बातों को आगे 
दुहराना नहीं है,
ये बड़ी कीमती हैं
भजाना नहीं है,
इन बातों का मतलब
तुम ही निकालो,
मुझे कुछ तुम्हें
समझाना नहीं है,

अन्यथा मत बनाना
बातों का शिवाला,
उस दर पर मुझे
सर नवाना नहीं है!

देर की सुबह

आज देर से उठी तुम 
रात भी सोती रही 
तुम्हारे साथ गलबहियाँ कर,

बादलों ने छींटे मारी 
खिड़की से अंदर आयी,
सूरज ने रोशनदान से 
झाँककर देखा
पाँव मे गुदगुदी की,

रात ने गेसुओं संग 
आंख पर पर्दा किया,
शरद ने हवा को 
कुछ सिहरन दिया,
स्वप्नों ने हाथ पकड़ा 
अंगड़ाईयों मे जकड़ा,

हवा के थपेड़ों ने 
छत चहलकदमी की,
आलस ने नींद से
जुगलबंदी की,

ऊषा को निराशा 
घेरने जब लगी,
बादलों से काजल
धुलने जब लगी,
ओस की बूँद 
आंखों लगाकार अली,
आज देर से
मिट्टी से सुरभि जगी!



अगला स्टेशन

अगली सीट तुम्हारी थी
तुम सफर मे सबको प्यारी थी,
तुम्हारी बाते मनरंगी
साथ तुम्हारा सत्संगी,
तुम्हारे किस्से बचपन के
शब्द तुम्हारे उपवन से,
क्षेत्र तुम्हारा त्रिभुवन-सा
मित्र तुम्हारे मोहन से,
प्रश्नों की गठरी रेशम की
अनुभव की पोटली दर्पण-सी,
सीखने की चाहत भँवरे की
राग जुटाती हर कण की,
उन्माद नदी के कलकल सी
आह्लाद भोर के कोकिल-सी,

पर अगला स्टेशन तुम्हारा है
इस सफर का यही किनारा है!

बचपन से बड़ी

तुम बचपन से ही 
कुछ बड़ी हो गई हो,
नादानी से उठकर 
खड़ी हो गई हो,

बाल-गोपाल वाले
ना की वो शरारत,
कोई बदमाश कहे
ऐसी आई न नौबत,

अंक ही त्याग बैठी
जिसको अपना न माना,
तुमने ममता की आंचल 
लूटा कर के जाना,

घसीटा किसी ने 
छुड़ा लायी ख़ुद को,
देखा किसी ने 
छुपा रखी खुद को,

भावना में बही ना 
रुद्र रूप ही दिखाया,
तुमने उंगलियों को 
मुट्ठी कर सजाया,

खार को भी गुलों से 
हटाती रही हो,
13 दिन मे सूरज 
उगाती रही हो,

तुमने दोस्तों को 
खुदा कर नवाजा,
उनके खंजरों को
अपने भीतर छुपाया,

बातें ईश्क वो 
समझ ही ना आयी,
गीत औरों के संग 
तुम नहीं गुनगुनाई,

दे दिए तुमने नंबर 
औरों को बढ़कर,
तुमने न शर्तें 
किसी की उठाई,

मिट्टी के घर मे
परी हो गई हो,
चेतना के शिखर पर
उड़ी बस गई हो,

सुरभि ही चंदन की
पहचान हो गई,
मिट्टी की गुड़िया 
सामान हो गई!






दो और दो

दो को दो कहने वाले
एक-एक कर के चले गए,
दो से दो मे बंटने वाले
खंजर लेकर खड़े रहे,

दो के ऊपर दो जे देखे
उनकी आँखें सूज गई,
दो की धार पकड़ने वाले
अपने हाथों बूझ गये,

दो से नैन मिलाने वाले
दोनों को ही खो बैठे,
दो बातें मीठी करने वाले
बातों के मद में उलझ गये,

दो और दो को चार समझ 
लकीरें दो- दो खींच लिया,
दो कदम मे पैरों को बाँधा 
दो हाथ से मुट्ठी भींच लिया,

दो से दो को मिलने दो 
दो से हाथ मिलाने दो,
दो और दो पाँच भी हो 
कुछ नादानी भी रहने दो!

ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...