Tuesday, 4 April 2023

रामगंगा

राम गंगा बहत सतत 
अविचल, अनवरत
श्वास संग लहर उठत
आवत-जात निरत चलत,

करकट मिलत, राह जुटत
रंग बिगड़त, खल जमत
अंधकार बढ़त, गंग छुपत
मन धुन्ध मे होत क्रुद्ध 
और भी जात बिगड़त,

राम गंगा बहत चलत
चलत रहत बहत रहत 
राम गंगा बहत रहत !





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