Sunday, 3 May 2026

निश्चय

यह किया निश्चय की 
करना था बहुत अद्भुत,
हमे करने लगे हैं लोग
क्यों धर्म से पदच्युत, 

आडंबरो का ज्यो हुआ
पथ पग पर पारावार,
सब हिल गया और डूबकर
मन विचलित, हृद त्राहीमाम,

घर तक लगी लौ
और कुछ छींटे अंगार की,
भेद देती गाहे बगाहे
जप-तप के दिवार की

दो निश्चयों का रास 
दो निश्चयों का रंग,
आ गया यह दौर मेरा
आते ही हुआ हुड़दंग!

प्यादा

प्यादा चले रानी की चाल
कुछ एक कदम तक बस,
प्यादा रहा छोटा, प्यादा रहा अदृश्य 
प्यादा रानी की ओट से
करता नृत्य सदृश्य,

रानी की ओर देखते सब
भर्त्सना से भरकर,
और रानी है खिन्न
सब काम भी करकर,
रानी के सब विचार 
और प्यादे के सब अंगार
रानी की सहज चेष्टा
प्यादे की धूर्त उपेक्षा,
प्यादा का हाहाकार 
रानी का तिरस्कार!

अच्छा

वह करता अच्छाई की खातिर 
उनके कहने पर, उनकी खातिर, 
कुछ उठाकर चला, कुछ तोड़कर
कुछ बिगाड़ने की खातिर, 

कुछ ऐसा कहा की कौन सोचे
किसकी वाणी बोलता 
कौन बोले किसकी जुबाँ की
स्याह सबमे घोलता,
किसी को पाकर अकेले 
बोल पाता कुछ 
किसी भी काम मे हाथ धरकर 
तिलमिलाता कुछ, 

और देखकर मुझको 
महज मुस्कराहट देता दिखा,
वह कालवश, काल से 
टकराकर अच्छा बना!

Sunday, 29 March 2026

किसने छोड़ा?

किसने छोड़कर हाथ मेरा
मुझपर कर दिया खिलवाड़,
किसने देखकर मुझको किया
सबसे पहले ही इंकार, 

या किसीको मैंने किया
जिंदगीभर दुश्वार, 
और किसी छोटी वजह पर
किया बड़ा पलटवार, 

ये किसने किया किसपर 
छोड़कर उपकार?

धृतराष्ट्र

अंधा है बैठा 
एक धृतराष्ट्र,
आज फिर
समाज में, 
लोकतंत्र के 
विशाल काज में,
मुँह में गुटका है 
और है आखों में 
एक तिरस्कार, 
गर्दन उठा कर 
देखता वो 
पांडवों की सर्कार, 
कुछ बोलता नहीं 
पर घोलता ज़हर, 
मंच से इधर जुटा कर 
संजयों की कतार,
ना वोट डालता
ना आवाज ही करता
फुंकार करता जोर से
दहाड़ता घर भर,
घुसमुसाया-फुसफुसाया
कसता सभी पर तंज,
आज का धृतराष्ट्र 
खुद से खेलता शतरंज!

Monday, 16 March 2026

अधिकार

तुम पर है अधिकार 
तुम्हारे होने का चलने का, 
तुम्हारे बातें मुझसे करने का 
और फिर तुमसे मिलने का, 

यह बोलो और फिर शांत रहो
मैं सोचूँ और तुम कर ही दो, 
मेरे रोने से पहले मेरे 
आँसू से मोती हाथ में लो, 

मैं ले लूँ तुमको आगोश धरूँ
मैं रात रागिनी बन महकूँ,
मैं अधरों के अंतर मे शामिल 
कर तुमको कुछ ना बोलूँ,
मैं ओढ़ तुम्हे सीपी जैसा
अपने को मोती कर लूँ,

मैं रात जगूँ, दिन भर सो लूँ
मै आग कहूँ और जल-नेत्र भरूँ
मैं सुबक-सुबक कर हाथ धरूँ
तुमपर सारे इल्ज़ाम रखूँ,
अपशब्दों की माला चुनकर 
रोज सुबह खाने में दूँ,

ना कलम रखूँ, ना बटन कसूँ
ऑफिस को होठों से धर लूँ,
बिंदी मे देखो मेरे तुम 
सूर्य-ग्रहण सा अंधकार, 
चांद रात की चादर से
मैं अपने तकिये मे कढ़ दूँ,

मैं जो चाहूँ तुमसे पा लूँ 
नभ-सा मेरा विस्तार प्रिये,
अपनी बगिया से उड़ आई
हमसफ़र मेरे, हमनफज मेरे,
तुम गगन, पवन से अंतहीन 
मेरी पंखों का अधिकार प्रिये!


Wednesday, 11 March 2026

कुछ बात

कुछ बात नहीं है 
कहने को 
वो चुप हैं, मैं मौन हूँ, 
कुछ नहीं हैं 
अलविदा के शब्द,
वो हैं और मैं
बस रहने को,
खैर किसका पूछें
की खैरियत कहते नहीं
सहने को,
आखों तक न पहुँची हँसी,
खिलखिलाहट है 
बस बहने को,
तुम और मैं 
अजनबीं हैं और 
हमसफर हैं बस चलने को!

Tuesday, 26 August 2025

जिम्मेवारी

लेकर बैठे हैं 
खुद से जिम्मेवारी, 
ये मानवता, ये हुजूम,
ये देश, ये दफ्तर 
ये खानदान, ये शहर,
ये सफाई,  कुछ कमाई 
एडमिशन और पढ़ाई, 
आज की क्लास 
कल सुबह का ऑडिट, 
उनका टिकट
इनका इतिहास!



ये

ये क्या है?
जिसका नाम नहीं है 
बातों में है और 
ज़िक्र नहीं है,
जो श्रोत है 
जीवनमृत का,
आकर्षण है
व्यभिचार का,

जो श्रद्धा है
मातृत्व का,
सीमा है
व्यक्तित्व का,
दायित्व है
संस्कार का,
और कृतित्व है
कलाकार का!

Monday, 4 August 2025

हुनर

दो हाथ से 
दो गज का 
माप ले लिया,
दो नजर मिलाकर 
दाम का 
सवाल कर लिया,
जीने के लिए 
जुटा लिया, 
अपने हुनर के 
जोर से,
दो रोटी, एक छत
और एक मुस्कान, 

सुबह चढ़कर ट्रेन मे
बांट दिया सामान, 
फैला दी एक चादर 
सुना दिया एक गीत, 
कुछ जुबान चला दी 
झाल खिलाकर, 
राम नाम से लुभाया 
हृदय गांठ खोलकर, 

कुछ उठा लिया बोझ 
जेब से निकाल, 
कर दिया 
माया से हल्का,
किसी के आंसुओं में 
किसी का रबाब छलका,
किसी से छेड़खानी की
किसी का नकाब उतरा, 
कोई बन गया लाचार
बोझ बताकर, 
लूट लिया किसीको 
कुछ और दिखाकर,
जीवन जीकर पा लिया 
जीने का हुनर!


सुबह

तुम उठी और 
मेरी सुबह हुई, 
तुम चली और 
फिर धरा चली, 
तुम बोली तो 
हवा ये बातें की, 
तुम रुकी तो 
हमने दृश्य दिखे, 
तुम आयी तो 
राम हृदय मे आ बैठे!

ठिठोली

झूला झूले रज का  कित टूटे और छूटे डोरी प्रिय संग का, यह उच्छ्वास पर निःश्वास, दोलन ऊपर को अंतर मे उल्लास, भय और रोमांच  करते नृत्य  जुगलबंदी...